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हे माँ,प्रचंड रूप धर आ जाओ

संध्या चतुर्वेदी ‘काव्य संध्या’
अहमदाबाद(गुजरात) 
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हो रहा अत्याचार मासूमों पर माँ,
बिलख रही किलकारी है माँ।
ले करके खड्ग और त्रिशूल माँ,
दुष्टों के शीश भेंट चढ़ा जाओ।
हे माँ प्रचंड रूप धर आ जाओ…ll

तब कोख में मरती थी कन्या,
अब तो जन्म के बाद उजड़ती है।
पैदा करने वाला बन गया भक्षक,
किससे अब रक्षा की गुहार करें माँ।
ले तलवार इन पिता रूपी दानव का सर,
धड़ से अलग कर जाओ माँ।
हे माँ प्रचंड रूप धर आ जाओ…ll

भाई,बहन की आबरू लूटे,कैसा कलयुग आया है,
पिता बन गया अब भक्षक,देख माँ का दिल घबराया है।
कोई जगह बची नहीं,अब जहाँ बेटी हो सुरक्षित,
नन्हीं कन्या रूप देवी का,फिर क्यों बेबस होती है ?
नन्हें-नन्हें से कोमल बदन पर क्यों जख्मों को सहती है ?
अब धरती पर आ जाओ माँ,
हे माँ प्रचंड रूप धर आ जाओll

परिचय : संध्या चतुर्वेदी का साहित्यिक नाम काव्य संध्या है। आपने बी.ए. की पढ़ाई की है। कार्यक्षेत्र में व्यवसाय (बीमा सलाहकार)करती हैं। २४ अगस्त १९८० को मथुरा में जन्मीं संध्या चतुर्वेदी का स्थाई निवास मथुरा(उत्तर प्रदेश)में है। फिलहाल अहमदाबादस्थित बोपल (गुजरात)में बसी हुई हैं। कई अखबारों में आपकी रचनाओं का प्रकाशन हो चुका है। लेखन ही आपका शौक है। लेखन विधा-कविता, ग़ज़ल, मुक्तक, दोहा, धनाक्षरी, कह मुकरिया,तांका,लघु कथा और पसंदीदा विषय पर स्वतंत्र लेखन है। संध्या जी की लेखनी का उद्देश्य समाज के लिए जागरुक भूमिका निभाना है। आपको लेखन के लिए कुछ सम्मान भी मिल चुके हैं|