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ईमानदारी से बड़ी विरासत नहीं

डॉ. प्रताप मोहन ‘भारतीय’
सोलन (हिमाचल प्रदेश)
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सतरंगी दुनिया-३०….

इस दुनिया में सिर्फ धोखा एवं धक्का ही मुफ्त में मिलता है, बाकी हर चीज की कीमत चुकानी पड़‌ती है। देखिए हमारे देश की हालत- कचरा उठाने वाला अनपढ़‌ है और कचरा फेंकने वाले पढ़े-लिखे। हर कोशिश में शायद सफलता नहीं मिल पाती है, लेकिन प्रत्येक सफलता का कारण कोशिश ही होती है। आपका लहज़ा बता देता है कि जुबान बोल रही है या पैसा। महंगाई इतनी बढ़ गई है कि १०० में आने वाली पुलिस ११२ में आ रही है। कर्म वो चिठ्ठी है, जो कभी भी गलत पते पर नहीं पहुंचती है, जिसने भेजी है, उसी के पास लौटती है। सुन लेने से कितने ही सवाल सुलझ जाते हैं और सुना देने से हम फिर वहीं उलझ जाते हैं। अगर आप सोचते हैं, कि सब दु:ख दूर होने के बाद मन प्रसन्न होगा, तो ये आपका वहम है…। मन प्रसन्न रखें, सब दु:ख स्वयं दूर हो जाएंगे। उन रिश्तों को टूटने दें, जिनकी वजह से आप टूट रहे हैं।
    ऊँचा उठने के लिए पँखों की जरूरत पक्षियों को पड़ती है, इंसान तो जितना नीचे झुकता है, उतना ही ऊपर उठता है। इस दुनिया में कोई व्यस्त नहीं होता है, सारा खेल जरूरत और पसंद का है। एक औरत ने मंदिर में अपने पति के लिए मन्नत मांग कर धागा बांधा, फिर कुछ सोचकर एकदम से धागा वापस खोल दिया। पति ने इसका कारण पूछा, तो पत्नी बोली-आपके लिए मन्नत मांगी थी, कि आपकी सारी मुसीबत दूर हो जाए। फिर खयाल आया कहीं मैं ही ना निपट जाऊँ। शहर की खूबसूरत बात यह है, कि वहाँ के लोगों के सपनों में हमेशा गाँव आता है। आत्मा की हत्या करके… अगर स्वर्ग भी मिले, तो वह नरक है। कुछ तूफान हमें मिटाने नहीं, बल्कि हमें हमारी ताकत याद दिलाने आते हैं। 
  अगर आपको अपना दर्द बाँटना है तो सावधानी से बाँटिए, क्योकि ये रिकॉर्डिंग और स्क्रीन शॉट का जमाना है। मैं जहर भी हूँ और शहद भी… स्वाद आपके व्यवहार पर निर्भर है। पत्नी से पीड़ित आद‌मी बाल कटवाने गया। नाई ने पूछा- साहब बाल कितने छोटे करूँ ? आदमी ने कहा-भाई इतने छोटे कर कि मेरी पत्नी के हाथों में ना आ सकें। कहते हैं कि दौलत साथ नहीं जाती, पर ये भी सच है कि मरते दम तक काम बहुत आएगी। अक्सर ये देखा गया है, कि अपनी खुद की पत्नी को छोड़‌कर पुरूष दूसरे की पत्नियों को क्यों देखते हैं ?, क्योंकि हर आदमी दूसरे की गलती हमेशा पहले देखता है, अपनी नहीं। अपनों के साथ आप चलें या न चलें, परन्तु अपनों के साथ चाल ना चलें।
    पहले मुझे अंधेरे से डर लगता था, फिर बिजली का बिल आया। बिल देखकर अब मुझे रोशनी से डर लगता है। प्रेमी अपनी प्रेमिका से कह रहा था- मैं उस लड़‌की से शादी करूंगा, जो बढ़ि‌या खाना बनाती हो, घर को साफ-सुथरा रखती हो और उसे साद‌गी पसंद हो। प्रेमिका ने उत्तर दिया- मेरे घर आना-हमारी नौक‌रानी में ये सारे गुण उपलब्ध है। सास और बहू में भयंकर लड़ाई हो गई। सास ने कहा- अगर मैं मर गई तो मेरी अर्थी को हाथ मत लगाना। बहू ने कहा- लगाऊँगी, हिम्मत हो तो उठ के रोक लेना। पड़ोसन खाना बना रही थी और मैं गली से निकल रहा था। मैंने सीटी मार दी..! उसने कुकर उतार दिया-न मेरी दाल गली…न उसकी।
  अजीब जमाना आ गया है रेस्टॉरेंट वाले अपने बोर्ड पर लिखते हैं-‘घर जैसा स्वाद’ और हमारी श्रीमती यू-ट्यूब पर सर्च करती है कि रेस्टारेंट जैसा खाना घर पर कैसे बनाएं। संस्कार से बढ़‌कर कोई वसीयत नहीं है और ईमानदारी से बड़ी कोई विरासत नहीं है। ज़िंदगी को इतना सीरियस लेने की जरूरत नहीं है साथियों, क्योंकि यहाँ से जिन्दा बचकर कोई नहीं जाता। रिश्तों की कदर भी पैसों की तरह कीजिए, क्योंकि दोनों कमाना आसान है, लेकिन संभाल कर रखना मुश्किल है। कुछ लोगों का साथ इसलिए छोड़ना पड़ता है, कि अगर नहीं छोड़ेंगे तो वे आपका कहीं का नहीं छोड़ेंगे।
आज कहीं से आएगी अच्छी खबर, 
किसी ने दी है मुझे ये अच्छी खबर।

परिचय-डॉ. प्रताप मोहन का लेखन जगत में ‘भारतीय’ नाम है। १५ जून १९६२ को कटनी (म.प्र.)में अवतरित हुए डॉ. मोहन का वर्तमान में जिला सोलन स्थित चक्का रोड, बद्दी (हि.प्र.)में बसेरा है। आपका स्थाई पता स्थाई पता हिमाचल प्रदेश ही है। सिंधी,हिंदी एवं अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले डॉ. मोहन ने बीएससी सहित आर.एम.पी.,एन. डी.,बी.ई.एम.एस., एम.ए., एल.एल.बी.,सी. एच.आर.,सी.ए.एफ.ई. तथा एम.पी.ए. की शिक्षा भी प्राप्त की है। कार्य क्षेत्र में दवा व्यवसायी ‘भारतीय’ सामाजिक गतिविधि में सिंधी भाषा-आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का प्रचार करने सहित थैलेसीमिया बीमारी के प्रति समाज में जागृति फैलाते हैं। इनकी लेखन विधा-क्षणिका, व्यंग्य लेख एवं ग़ज़ल है। कई राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन जारी है। ‘उजाले की ओर’ व्यंग्य संग्रह प्रकाशित है। आपको राजस्थान से ‘काव्य कलपज्ञ’,उ.प्र. द्वारा ‘हिन्दी भूषण श्री’ की उपाधि एवं हि.प्र. से ‘सुमेधा श्री २०१९’ सम्मान दिया गया है। विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय अध्यक्ष (सिंधुडी संस्था)होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-साहित्य का सृजन करना है। इनके लिए पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचंद एवं प्रेरणापुंज-प्रो. सत्यनारायण अग्रवाल हैं। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“हिंदी को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिले,हमें ऐसा प्रयास करना चाहिए। नई पीढ़ी को हम हिंदी भाषा का ज्ञान दें, ताकि हिंदी भाषा का समुचित विकास हो सके |