कुल पृष्ठ दर्शन : 6

आज सबसे बड़ी जरूरत ‘वसुधा संरक्षण’

राधा गोयल
नई दिल्ली
***********************************

आज हमें यह सोचना पड़ेगा कि हमारी सबसे बड़ी जरूरत क्या है ?प्रगति के नाम पर विनाश या प्रकृति की रक्षा करना ? जो जीवों की रक्षा करते हैं, उन साधनों को नष्ट करना या उनको बचाना ? पुरानी परम्पराओं की बलि चढ़ाना या उनसे कुछ सीखना ?
      हमारे वेद पृथ्वी, अग्नि, जल, पर्वत, वायु और वृक्षों की प्रार्थना करते हुए कहते हैं ये सभी देवता यथावत रूप में मनुष्य के लिए सदा उपलब्ध रहें। इनके बिना किसी प्राणी मात्र के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। पृथ्वी हमारी माता है और हम सभी इसके पुत्र हैं। यह हमें रहने का आधार देती है।इसकी कोख से ही हम अन्न जल तथा वस्त्रादि पदार्थ प्राप्त करते हैं। इसके विस्तार का ही प्रताप है, कि सभी जीव स्वेच्छा और स्वतंत्रता से स्वछंद विचरण करते हैं। पर्वत अपने भार से जगह-जगह स्थिर रहकर धरती का संतुलन बनाए रखते हैं। ये सभी हमें सदा देते ही रहते हैं, बदले में कभी कुछ नहीं माँगते। देना ही इनका स्वभाव है।
     किसी भी भौतिक तत्व के बिना हमारे लिए जीवित रह पाना कुछ समय के लिए संभव भी हो सकता है, किंतु क्या वायु के बिना एक दिन भी जीवित रहा जा सकता है ?      
   शुद्ध वायु हमें वृक्षों से मिलती है, क्योंकि वृक्ष धरा का श्रृंगार हैं। यह धरती की विषैली गैसों का शोषण करके जीवनदायिनी गैसों का उत्सर्जन करते हैं।
    सवाल है कि क्या हमारे द्वारा इन्हें इस तरह क्रूरता से काटे जाना चाहिए ? सही मायने में हमें इन्हें पूजना चाहिए। इनके संरक्षण और संवर्धन पर ध्यान देना चाहिए। हमारे प्राचीन लोगों की तरह इन्हें देवतुल्य मानकर इनका रक्षक बनना होगा।पेड़ काटने की बजाए नए पेड़-पौधे लगाने होंगे; तभी धरा पर जीवन बच पाएगा।
आज सारा विश्व अपनी करनी का फल भुगत रहा है। गर्मी के कारण जीना मुहाल है। गर्मी से कितने लोग अकाल मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं। विश्व आज संहार के मुहाने पर खड़ा है। अब भी आप अगर नहीं सुधरे और जल, जंगल, जमीन का इसी तरह दोहन होता रहा… इसी तरह से वृक्ष काटे जाते रहे… पर्यावरण को इसी तरह से नुकसान पहुँचाया जाता रहा, तो याद रखो… वह दिन दूर नहीं… जब सम्पूर्ण संसार नष्ट हो जाएगा।
     जरूरत है फिर से अपनी प्राचीन संस्कृति अपनाने की, प्रकृति की रक्षा करने की, पर्यावरण को संतुलित करने की। आधुनिकता की चकाचौंध में अंधी हुई औलादों… विश्व को विनाश के गर्त में मत ढकेलो।
        रोज नये-नये ग्रहों-उपग्रहों की खोज करने की क्या जरूरत है ?हमारे ॠषि मुनियों ने हजारों वर्ष पहले प्रकाश वर्ष से लाखों मील दूर के ग्रह नक्षत्रों की खोज कर ली थी जिसके लिखित अनेक प्रमाण भी हैं। हनुमान चालीसा तो सर्व विदित है। हर भारतवासी को जुबानी कंठस्थ है। जरा ध्यान से उसके एक-एक शब्द पर गौर करना तो बहुत कुछ समझ जाओगे।
      दूसरे नक्षत्रों पर जीवन और पानी खोजने से बेहतर है कि इस धरा पर जीवन और पानी के संरक्षण पर ध्यान दो। आज यही सबसे पहली आवश्यकता है। कोई देश… किसी अन्य देश की सीमाओं पर अनावश्यक आक्रमण या अतिक्रमण करने की योजनाएँ न बनाए।
        ‘जियो और जीने दो में विश्वास रखें’, आज यही समय की सबसे बड़ी जरूरत है। यदि हर व्यक्ति यह संकल्प कर ले कि अपने व बच्चों के जन्मदिन तथा वैवाहिक वर्षगांठ पर हर बार एक पौधा लगाना है तो हमारा इतना-सा काम भी वसुधा के संरक्षण में कुछ तो मददगार होगा।
  बढ़ता हुआ खतरनाक प्रदूषण और उसे दूर करने के लिए हमारी जिम्मेदारी भी समझनी पड़ेगी।बदलते पर्यावरण और पृथ्वी के बीच जहाँ हम प्राकृतिक पहाड़ों को खो रहे हैं, वहीं हमने दुनिया में नए पहाड़ों को जन्म दे दिया और वह है प्लास्टिक के पहाड़। आज हमारे घर में ढेरों प्लास्टिक आइटम हैं, जो प्रतिदिन उपयोग में आती हैं। चाहे वह ग्रॉसरी बैग हो या प्लास्टिक पेपर या डिस्पोजेबल कटलरी कप।  हम अपने-आपको बहुत आधुनिक समझने लगे हैं। एक व्यक्ति ही एक दिन में १० टिश्यू पेपर इस्तेमाल कर लेता है। पहले के लोग ज्यादा समझदार थे। वे पर्यावरण के प्रति सजग थे, लेकिन आजकल की तथाकथित बहुत पढ़ी-लिखी युवा पीढ़ी इस बात को नहीं समझती। वह उस मेज को भी टिश्यू पेपर से साफ करेंगे, लेकिन समझदार समझने वाले लोग किसी और को भला क्यों समझदार समझने लगे। उनको तो पानी भी बिसलरी का चाहिए। क्या वे नहीं जानते कि ना जाने कितने महीनों पहले वह पानी बोतलों में भरा जाता है और वह इतनी पतली बोतल होती हैं कि उसमें कीटाणु पनपने लगते हैं। लेकिन अति आधुनिक समझने वाले लोग रोजाना उस प्लास्टिक का पानी इस्तेमाल करते हैं और कूड़े का अंबार खड़ा करते हैं। कोई आजकल के तथाकथित पढ़े-लिखों को कैसे समझाए.
..?
  आजकल शहरों की बात तो छोड़ो, गाँव में भी ये सब उपलब्ध हैं। माना उपभोक्ताओं के लिहाज से यह सुविधाजनक है; लेकिन पर्यावरण के लिए बेहद नुकसानदायक। इसी आधुनिकता का नतीजा है कि बरसात के पानी से कहीं पर भयंकर बाढ़ आती है तो कहीं इसलिए सूखा पड़ता है क्योंकि लोगों की धनलिप्सा ने और विकास के नाम पर लोगों ने पेड़ काटना तो सीखा है, लेकिन पेड़ कुछ लोग ही लगाते हैं। नेता लोग तो खासकर पौधरोपण करते हैं, फोटो खिंचवाते हैं और उसके बाद उन पौधों की देखभाल हो रही है या नहीं, वे कभी आकर झांकते भी नहीं।
   ज्यादातर समारोहों में देखा होगा कि प्लेट चम्मच सब कुछ प्लास्टिक का होता है, जिसके कारण कूड़े का अंबार लग जाता है। इससे तो बेहतर है कि २ लोगों को बर्तन साफ करने के काम में लगाया जाए। उससे रोजगार भी मिलेगा। ऐसा मैंने जेल रोड स्थित संतोषी माता मंदिर में देखा, जहाँ नवरात्रों में रोजाना कम से कम १० हजार लोग भोजन करते हैं। थालियाँ स्टील की होती हैं जिनमें कटोरियाँ भी बनी होती हैं। कई लोग खाना बनाने के काम में लगे होते हैं और मुफ्त सेवा करते हैं तो कई लोग बर्तन साफ करने के काम में लगे होते हैं। ऐसा ही मैंने खाटूश्यामजी में कोलकाता वालों की धर्मशाला में देखा। यदि वे ऐसा कर सकते हैं तो हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते!, लेकिन हम तो ठहरे पढ़े-लिखे शहरी।
     आदमी जितना अधिक पढ़ा-लिखा होता जा रहा है, उतना ही अधिक अज्ञानी भी होता जा रहा है। पहले कभी हम लोग चाट वगैरह पत्तों से बने हुए दोनों में खाते थे। केले के पत्तों पर भोजन करते थे। ये पत्ते शरीर के साथ-साथ प्रकृति के लिए बेहद लाभदायक थे। पर्यावरण को इनसे कोई नुकसान नहीं होता था, अपितु यह धरती की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने में सहायक होते थे।
    यदि हमें धरती को बचाना है,रोग मुक्त रहना है, तो अपने पुराने जीवन मूल्यों को अपनाना पड़ेगा। प्लास्टिक का उपयोग बंद करना पड़ेगा। तभी हम इस प्रदूषण से मुक्ति पा सकते हैं। वरना एक दिन ऐसा आएगा कि धरती पर साँस लेना भी मुश्किल हो जाएगा।
  आजकल के पढ़े-लिखे लोग कहने को ही पढ़े-लिखे हैं, लेकिन महा अज्ञानी हैं। जब तक समझेंगे, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी और केवल मानव ही नहीं, अपितु नदियों व महासागरों में रहने वाले जीव जंतुओं के जीवन पर भी बहुत बड़ा संकट पैदा हो जाएगा। पैदा तो हो ही चुका है। अब जरूरत इस बात की है कि वक्त रहते हम लोग इस बात को समझ लें कि वसुधा का संरक्षण हमारे अस्तित्व के लिए बहुत जरूरी है।
हम हर काम के लिए सरकार को दोष दे देते हैं। क्या पर्यावरण के प्रति हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है।
जागो, सोचो, मनन करो। यह आज के युग की बहुत बड़ी आवश्यकता है।