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लोक का हिस्सा बन गई हैं पंचतन्त्र की कथाएँ-डॉ. जोशी

उज्जैन(मप्र)।

पंचतन्त्र वेदों से चलकर लोक में आया है और आज इसकी कथा लोक का हिस्सा बन गई है। संजा लोकोत्सव विलुप्ति की और बढ़ रही लोकसंस्कृति के संरक्षण का सराहनीय कार्य कर रहा है।
   प्रतिकल्पा सांस्कृतिक संस्था (उज्जैन) द्वारा भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय एवं मध्य प्रदेश शासन के सहयोग से हुई अंतरराष्ट्रीय शोध संगोष्ठी एवं लोक साहित्य महोत्सव २०२६ में यह बात अतिथि विद्वान डॉ. उमा जोशी (कला विदुषी जयपुर) ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कही। कालिदास संस्कृत अकादमी सभागार में यह संगोष्ठी ‘भारत का लोक और जनजातिय साहित्य एवं संस्कृतिःसंवेदना, पारंपरिक ज्ञान, पर्यावरण और पारिस्थितिकी’ पर हुई, जिसमें अतिथि विद्वान डॉ. सोमदत्त काशीनाथ, सुरेश चन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’, पद्मश्री भेरूसिंह चौहान, प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा व माया मालवेंद्र बदेका आदि ने व्याख्यान दिए। इस अवसर पर पंचतंत्र पर केंद्रित लघु चित्रों की प्रदर्शनी का आयोजन डॉ. जोशी द्वारा किया गया।
मुख्य अतिथि पुराविद पद्मश्री डॉ. नारायण व्यास ने प्रागैतिहासिक शैल चित्र परंपरा के साथ लोक चित्रों के संबंध को निरूपित किया।
भेरूसिंह चौहान ने कहा कि हमारी कला, संस्कृति और परम्परा लुप्त न हो और इसे सहेजा जा सके, संजा लोकोत्सव इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
  मुख्य समन्वयक कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा ने कहा कि लोक और जनजातीय संस्कृति में
प्रकृति के साथ गहरा भावनात्मक और आत्मीय रिश्ता है।
   डॉ. महेश अग्रवाल (तेलंगाना), डॉ. काशीनाथ, डॉ. मोहनलाल वर्मा व डॉ. शुक्ल ने भी व्याख्यान दिए।
  तकनीकी सत्र का अध्यक्षीय उद्बोधन डॉ. रामचंद्र ठाकुर ने दिया। संस्था की निदेशक डॉ. पल्लवी किशन ने संस्था और लोकोत्सव की संकल्पना प्रस्तुत की।
  सत्र का संचालन प्रो. जगदीशचंद्र शर्मा ने किया। आभार प्रदर्शन डॉ. शिव चौरसिया ने माना।