नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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आया सावन, झम-झम बरसा,
भीग गया सबका मन भी
भीग गई तुलसी हरी,
और खिलने लगे फूल पौधे सभी
घर-आँगन को भिगो दिया पानी,
सावन में जब पानी बरसा
धो देता है मन का मैल सभी।
गुस्सा हो, या गिला हो, या शिकवा हो,
सभी को सावन बहा ले जाता
मन के सूखे खेतों में भी,
जम जाती है पानी की नमी
सूखे रिश्तों में भी,
हरियाली ला देता
टूटे सपनों में भी,
फिर से नया जोश भर देता।
परत दर परत जो गंदी हो गई थी,
जो मैल मन में जम गई थी
सावन की फुहार पड़ते ही,
मन का वह मैल धुल गया
मन का हर कोना खिल गया।
मन में जो काली-काली घटाएँ थीं,
वे भी बादल बनकर बरस गई
मिट्टी में खुशबू बिखरने लगी,
सभी पेड़-पौधे धुलकर चमकने लगे
मचलने लगी उम्मीद,
फिर से आशा जग गई
सावन आया,
तन और मन दोनों धो दिया।
मन स्वच्छ हुआ,
और दिल खिल गया
सावन में खूब भीगना।
धो देता है सारा मैल,
मन का सारा मैल॥f