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क्या यही प्यार है ?

डॉ. श्राबनी चक्रवर्ती
बिलासपुर (छतीसगढ़)
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घड़ी की सुइयाँ,
हर दिन दो बार मिलती हैं
ठीक बारह बजे,
बाकी समय
सिर्फ पीछा करती है
एक-दूसरे का
क्या यही प्यार है ?

स्निग्ध गुलाब संग तीखे काँटे,
रहते हैं साथ साथ
सुगंध और बहार बिखेरते,
कोई तोड़े गर गुलाब को
तो काँटों से लहूलुहान हो,
रक्षा करता उस पुष्प का
क्या यही प्यार है ?

कैसे दिन कटता है,
रोज इतने व्यस्त कार्यों में
शाम आते-आते ठहर जाती हैं,
तुमसे मुलाकात हो न हो
पर बात किए बिना,
रात गुजरती नहीं
क्या यही प्यार है ?

ऊँची-ऊँची लहरें,
सागर से उठकर
साहिल से मिलने के लिए,
मचल जाती हैं
साहिल तक आते-आते टूट कर,
उसकी आगोश मे समा जाती हैं
क्या यही प्यार है ?