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‘गलती’ पीठ की तरह

डॉ. प्रताप मोहन ‘भारतीय’
सोलन (हिमाचल प्रदेश)
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सतरंगी दुनिया -३५…

अच्छे जरूर बनें, परन्तु जरूरत से ज्यादा नहीं। अगर ज्यादा अच्छे बनेंगे तो नीम्बू की तरह निचोड़ दिए जाओगे। याद रखिए, जहां से छल शुरू होता है, वहां से महाभारत शुरू होती है। जो चीज मन की शांति को छीन ले-उसे छोड़ देना ही समझदारी है; चाहे वह आदत हो, सोच हो या कोई रिश्ता। एक बार थानेदार, कलेक्टर और मास्टर बैठे हुए थे। तब थानेदार ने शेखी बघारते हुए कहा-मेरा बहुत रौब है, जब जी चाहे, किसी को भी पीट सकता हूँ। इसका समर्थन करते कलेक्टर ने कहा- मैं भी जिले का राजा हूँ, मैं जो चाहे कर सकता हूँ। आखिरी में मास्टर ने कहा- मेरा तो काई रौब नहीं है, सारा दिन छात्रों को चाँटे मारता हूँ, आगे उनकी किस्मत-कलेक्टर बनें या थानेदार।
   शादीशुदा व्यक्ति की गर्लफ्रेन्ड उसके घर आई। उसको देखकर बीबी चिल्लाई और बोलने लगी- एक म्यान में २ तलवार नहीं रह सकती है। पति ने प्यार से समझाया अब तलवार का जमाना नहीं है अब रिवाल्वर का जमाना आ गया है और इसमें हमेशा ६ गोलियाँ रहती हैं।
   आज नॉन खटाई खाने का अवसर प्राप्त हुआ। यह बहुत मीठी और स्वादिष्ट होती है, पर मुझे अभी तक समझ नहीं आ रहा है, कि मीठी होने के बाद भी इसका नाम नॉन खटाई क्यों रखा है ? अगर नॉन मिठाई रखते तो क्या बिगड़ ‌जाता। जब भी अवसर मिले, किसी के हँसने की वजह बनो, क्योंकि जलाने के लिए तो सारी दुनिया तैयार बैठी है। दूसरों के गुनाह गिनने से हम बेगुनाह नहीं हो जाते हैं। टेंशन एक ऐसा उपहार है, जो हमारे अपने ही हमें देते हैं।
  गलती पीठ की तरह होती है, इसलिए हमें हमेशा औरों की ही दिखती है; अपनी नहीं। कुछ लोग शकुनि की तरह होते हैं, खेल भी सारे खेलते हैं और महान बन जाते हैं। फिर ऐसा दिखाते हैं, जैसे उन्हें कुछ पता ही नहीं। सप्ताह में ७ वार होते हैं और आठवां वार है, परिवार। अगर आपका आठवां वार ठीक है तो हर वार, त्योहार बन जाता है।
   सौ साल के एक बुजुर्ग बीड़ी पी रहे थे, किसी पत्रकार ने प्रश्न किया- बाबा जी बीड़ी क्यों पीते हो, इससे फेफड़े खराब हो जाते हैं, खांसी भी होती है। बुजुर्ग बोले-क्या करूँ बेटा – आदत पड़ गई है। शराब पीने के बाद बीड़ी पिए बिना चैन नहीं आता। पत्रकार ने फिर कहा- बाबा आपको कोई टोकता नहीं है। बुजुर्ग ने कहा – क्या बताऊं बेटा- जो लोग रोका-टोकी करते थे सब ऊपर चले गए। आज बहुत दिनों बाद तुमने टोका है।
    इतिहास में २ प्रकार के मामा अमर हैं एक, शकुनि और दूसरा कंस। अब बताइए आपके मामा कौन से हैं ? हमेशा ईमानदारी से पैसे कमाएं, आपके शौक भले पूरे न होंगे, बल्कि नींद रोज पूरी होगी। किसी के दाएं-बाएं खड़े होने से आपका किरदार ऊँचा नहीं होता- अगर स्वयं की औकात होगी तो दुनिया कद्र करेगी। मृत्यु के बाद एक लड़‌की यमराज के पास पहुंची। यमराज ने पूछा- तुम स्वर्ग जाना चाहती हो या नरक ? लड़की ने कहा -प्रभु आप पृथ्वी से मेरा मोबाईल और चार्जर मंगवा दीजिए, मैं कहीं भी रह लूँगी।
  फेसबुक भी कमाल की चीज है, जिनकी माला फेरने की उम्र हो गई है, वो भी वरमाला डालने की आस नहीं छोड़ रहे हैं। आज लड़‌की वाले मुझे देखने आ रहे थे, रोड बहुत खराब था तो वापस चले गए। बोले-जब रास्ता इतना खराब है तो लड़‌का कितना खराब होगा ? सोचा कुछ, हुआ कुछ और मिला कुछ -यही जीवन है ! हमारी ज़िंदगी एक खेल है, जिसमें हम खिलाड़ी भी हो सकते हैं और खिलौना भी। यह हमारे व्यवहार के ऊपर निर्भर रहता है। इस कलियुग में हमेशा तैयारी के साथ रहें, क्योंकि इंसान और मौसम कब बिगड़‌ जाए, किसी को नहीं पता।
     जिस दिन हम यह समझ जाएंगे कि सामने वाला गलत नहीं है, सिर्फ उसकी सोच हमसे अलग है; उस दिन जीवन में सारे दु:ख स्वयं ही समाप्त हो जाएंगे। जीवन है- गलतियाँ होती रहती हैं, बस इरादे गलत नहीं होना चाहिए।
ज़िंदगी का सबसे बड़ा दु:ख, आँख का अँधा, नाम-नयनसुख।

परिचय-डॉ. प्रताप मोहन का लेखन जगत में ‘भारतीय’ नाम है। १५ जून १९६२ को कटनी (म.प्र.)में अवतरित हुए डॉ. मोहन का वर्तमान में जिला सोलन स्थित चक्का रोड, बद्दी (हि.प्र.)में बसेरा है। आपका स्थाई पता स्थाई पता हिमाचल प्रदेश ही है। सिंधी,हिंदी एवं अंग्रेजी भाषा का  ज्ञान रखने वाले डॉ. मोहन ने बीएससी सहित आर.एम.पी.,एन. डी.,बी.ई.एम.एस., एम.ए., एल.एल.बी.,सी. एच.आर.,सी.ए.एफ.ई. तथा एम.पी.ए. की  शिक्षा भी प्राप्त की है। कार्य क्षेत्र में दवा व्यवसायी ‘भारतीय’ सामाजिक गतिविधि में सिंधी भाषा-आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का प्रचार करने सहित थैलेसीमिया बीमारी के प्रति समाज में जागृति फैलाते हैं। इनकी लेखन विधा-क्षणिका, व्यंग्य लेख एवं ग़ज़ल है। कई राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन जारी है। ‘उजाले की ओर’ व्यंग्य संग्रह प्रकाशित है। आपको राजस्थान से ‘काव्य कलपज्ञ’,उ.प्र. द्वारा ‘हिन्दी भूषण श्री’ की उपाधि एवं हि.प्र. से ‘सुमेधा श्री २०१९’ सम्मान दिया गया है। विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय अध्यक्ष (सिंधुडी संस्था)होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-साहित्य का सृजन करना है। इनके लिए पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचंद एवं प्रेरणापुंज-प्रो. सत्यनारायण अग्रवाल हैं। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“हिंदी को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिले,हमें ऐसा प्रयास करना चाहिए। नई पीढ़ी को हम हिंदी भाषा का ज्ञान दें, ताकि हिंदी भाषा का समुचित विकास हो सके |