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था साहस और संकल्प

बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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अहिंसा का पुजारी (गांधी जयंती विशेष)…

हाथ में कोई हथियार नहीं था,
फिर भी एक दुबला-सा मनुष्य
साम्राज्य की नींव हिला गया।

उसके पास
न सेना थी,
न सत्ता का सिंहासन
न भय दिखाने की शक्ति।

उसके पास था-
सत्य पर अडिग रहने का साहस
और अहिंसा को
जीवन में उतारने का संकल्प।

वह जानता था-
हिंसा शरीर को घायल कर सकती है
लेकिन अहिंसा,
मनुष्य के भीतर सोई हुई मनुष्यता को जगा सकती है।

उसने विरोध किया,
पर घृणा नहीं की
उसने अन्याय के सामने सिर नहीं झुकाया,
पर अन्यायी के प्रति भी
मन में मनुष्यता बचाए रखी।

उसके चरखे की धीमी गति में,
एक पूरे देश की आत्मनिर्भरता का स्वप्न था
उसकी खादी में,
श्रम की गरिमा थी
और उसके पैरों की यात्रा में,
भारत के गाँवों की पीड़ा।

वह कहता था-
सत्य केवल बोलने की वस्तु नहीं
सत्य को जीना पड़ता है।

और अहिंसा,
केवल किसी को चोट न पहुँचाने का नाम नहीं
अहिंसा तो वह चेतना है,
जहाँ दूसरे के दुःख को
अपने भीतर महसूस किया जाता है।

आज,
जब शब्दों में क्रोध बढ़ रहा है
जब असहमति के लिए,
मनुष्य मनुष्य से दूर होता जा रहा है
जब छोटी-सी बात,
दीवार खड़ी कर देती है।

तब गांधी,
स्मारकों में नहीं
हमारे व्यवहार में खोजे जाने चाहिए।

उनकी तस्वीर पर
माला चढ़ाना पर्याप्त नहीं,
जरूरी है
अपने भीतर के क्रोध को पहचानना,
अपने अहंकार को थोड़ा पीछे रखना
और किसी कमजोर के सामने
अपनी शक्ति का दुरुपयोग न करना।

गांधी जयंती-
सिर्फ एक तारीख नहीं,
अपने भीतर यह प्रश्न रखने का दिन है।

क्या मेरे शब्दों में अहिंसा है,
क्या मेरे व्यवहार में सत्य है
क्या मेरे निर्णय में,
दूसरे मनुष्य के लिए भी जगह है
क्योंकि गांधी-
सिर्फ इतिहास का एक अध्याय नहीं,
एक कठिन रास्ते का नाम हैं।

वह रास्ता-
जहाँ हाथ खाली होते हैं,
लेकिन अंतरात्मा मजबूत होती है
जहाँ प्रतिशोध के स्थान पर,
क्षमा खड़ी होती है।

जहाँ हिंसा के सामने,
अहिंसा चुप नहीं रहती
बल्कि,
पूरे साहस के साथ
अन्याय का सामना करती है।

अहिंसा का वह पुजारी,
आज भी पूछ रहा है
हमने आज़ादी तो पा ली,
पर क्या हम
अपने भीतर के भय, घृणा और हिंसा से
सचमुच मुक्त हो पाए हैं॥