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‘नाना’ किरदारों में उतर जाने वाला अभिनेता

अजय जैन ‘विकल्प’
इंदौर (मध्यप्रदेश)
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ऐतिहासिक भारतीय सिनेमा में कुछ अभिनेता पर्दे पर आते हैं और किरदार निभाकर चले जाते हैं, जबकि कुछ ऐसे होते हैं, जो किरदार को अपनी मौजूदगी से नई पहचान दे देते हैं। नाना (विश्वनाथ) पाटेकर इसी दूसरी श्रेणी के अभिनेता रहे। उनकी आवाज में ठहराव था, संवादों में धार और आँखों में वह बेचैनी, जो बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कह जाती थी। उन्होंने नायक बनाम अभिनेता की पारंपरिक परिभाषा को कभी अपना आधार नहीं बनाया। करीब 5 दशक के फ़िल्मी सफ़र और लगभग 90 फिल्मों में उन्होंने साबित किया कि अभिनेता की असली ताकत उसकी छवि और चेहरा नहीं, बल्कि किरदार में उतर जाने की क्षमता होती है।
   1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में जन्मे विश्वनाथ पाटेकर को दुनिया ने ‘नाना’ पाटेकर के नाम से जाना। उनका अभिनय सफ़र रंगमंच से शुरू हुआ और 1978 की ‘गमन’ से फिल्मों तक पहुंचा। उनका शुरुआती दौर आसान नहीं था। उन्होंने छोटे-बड़े कई किरदार किए, लेकिन अपने लिए कोई सुविधाजनक रास्ता नहीं चुना। रंगमंच ने उन्हें संवाद बोलने से ज्यादा संवाद को महसूस करना यानी जीना सिखाया। यही वजह रही, कि उनके अभिनय में बनावटीपन कम और जीवन की खुरदरी सच्चाई अर्थात कड़वाहट अधिक दिखाई देती थी।
   ‘अंकुश’ ने उन्हें पहचान दिलाई, लेकिन 1989 की ‘परिंदा’ ने उनके फ़िल्मी करियर को निर्णायक मोड़ दिया। अपराध की दुनिया से जुड़े अन्ना के किरदार में उन्होंने भय, क्रूरता और असुरक्षा को एकसाथ उतारा। यह केवल खलनायक का अभिनय नहीं था; वह ऐसा चरित्र था जिसके भीतर का अंधेरा हर दर्शक महसूस कर सकता था। इस भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर सम्मान मिला, जो उनके अभिनय की प्रसिद्धि भी बनी और ठहराव भी। इसके बाद तो ‘तिरंगा’, ‘अंगार’ और ‘प्रहार:द फाइनल अटैक’ जैसी फिल्मों ने उनकी अलग पहचान को मजबूत किया।
   1994 की ‘क्रांतिवीर’ को नाना पाटेकर के करियर की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में गिना जाता है। इसमें उनके द्वारा निभाया गया प्रताप नारायण तिलक का किरदार व्यवस्था से असंतुष्ट एक आम आदमी की आवाज बन गया। उनके संवादों में केवल गुस्सा नहीं था, बल्कि उस गुस्से के पीछे छिपी सामाजिक बेचैनी और परेशानी भी थी। इस भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। यही वह दौर था, जब नाना पाटेकर किसी एक श्रेणी के अभिनेता नहीं रहे; वे अपने-आपमें एक अभिनय-शैली बन चुके थे।
   खास बात यह रही कि नाना पाटेकर की प्रतिभा की असली परीक्षा तब भी होती रही, जब भूमिका के लिए आक्रामकता नहीं, संवेदना चाहिए थी। इसी दौरान इन्होंने ‘खामोशी:द म्यूजिकल’ में जोसेफ ब्रैगांजा के रूप में एक संवेदनशील पिता की पीड़ा को बिना अनावश्यक नाटकीयता के सामने रखा, तो ‘अग्निसाक्षी’ में उनके अभिनय को फिर राष्ट्रीय सम्मान मिला। फिर आई फ़िल्म ‘अब तक छप्पन’ में पुलिस अधिकारी साधु आगाशे का संयमित लेकिन कठोर व्यक्तित्व और राजनीति में सत्ता के समीकरणों के बीच उनका चरित्र उनकी विविधता दिखाता है। फिर ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी आया—तो गंभीर अभिनेता की बनी-बनाई छवि टूट गई। उनकी टाइमिंग, ठहराव और विशिष्ट हँसी ने हास्य के क्षेत्र में भी उन्हें लोकप्रिय बना दिया। ‘वेलकम बैक’ में भी उन्होंने यही लोकप्रियता दोहराई। इससे उन्होंने यह साबित किया कि ‘नाना’ बस नाम नहीं है, बल्कि अभिनय हर रंग और रस में बोलता है।
   यदि बात करें मराठी सिनेमा की, तो यहाँ ‘नटसम्राट’ फ़िल्म नाना पाटेकर की अभिनय-यात्रा का एक अलग शिखर है। उम्रदराज रंगकर्मी गणपत बेलवलकर के रूप में उन्होंने कलाकार के अहंकार, आत्मसम्मान, परिवार से दूरी और अकेलेपन को जिस गहराई से निभाया, वह अभिनय से आगे जाकर जीवन का असली अनुभव लगता है। ‘डॉ. प्रकाश बाबा आमटे: द रियल हीरो’ में वास्तविक जीवन के समाजसेवी का चरित्र और ‘द अटैक्स ऑफ 26/11’ में पुलिस अधिकारी की भूमिका भी उनकी गहराई और अभिनय सीमा को सामने लाती है। इसके बाद के वर्षों में ‘द वैक्सीन वॉर’, ‘वनवास’, ‘हाउसफुल 5’और 2026 की फिल्मों में भी अभिनय के अलग-अलग रूपों में उनकी उपस्थिति बनी रही।
  सम्मान के अनुसार नाना पाटेकर के खाते में 3 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार हैं—’परिंदा’ और ‘अग्निसाक्षी’ के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता तथा ‘क्रांतिवीर’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता। वर्ष 2013 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। अभिनय के साथ उन्होंने लेखन और निर्देशन में भी हाथ आजमाया। एक शानदार फ़िल्म ‘प्रहार:द फाइनल अटैक’ में उन्होंने निर्देशन की जिम्मेदारी संभाली। इन सम्मानों से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने व्यावसायिक सिनेमा और गंभीर फिल्मों के बीच अपनी जगह बनाए रखी। हर फ़िल्म में  अपने अभिनय से प्रभावित किया, फिर भले ही उस फ़िल्म को असफल माना गया हो।
  इसी तरह फिल्मों से बाहर उनका सामाजिक पक्ष भी उल्लेखनीय रहा। किसानों और ग्रामीण समुदायों की समस्याओं के प्रति उनकी संवेदनशीलता सबने देखी और मकरंद अनासपुरे के साथ नाम फाउंडेशन के जरिए महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में सहायता के प्रयास हुए। अपनी प्रसिद्धि को सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ने की यह कोशिश उनके व्यक्तित्व का अलग पहलू थी, जिसके पीछे यह सोच थी कि प्रभावितों को सहायता मिले।
   यूँ कहें कि नाना पाटेकर की सबसे बड़ी उपलब्धि पुरस्कारों की संख्या या फिल्मों की गिनती नहीं, वरन असली उपलब्धि यह है कि उन्होंने दर्शकों को बार-बार अपनी धारणा बदलने पर मजबूर किया। ‘परिंदा’ में भय, ‘क्रांतिवीर’ में आक्रोश, ‘खामोशी’ में संवेदना, ‘अब तक छप्पन’ में कठोरता, ‘वेलकम’ में हास्य और ‘नटसम्राट’ में टूटते मनुष्य की पीड़ा रूपी अभिनय से स्पष्ट समझाया कि कि हर जगह वो अभिनेता अलग दिखाई देता है, लेकिन उसकी पकड़ उतनी ही मजबूत रहती है। यही नाना पाटेकर की कला का सार है। उन्होंने सिर्फ किरदार यानी पात्र नहीं निभाए; बल्कि उन्हें ऐसा जीवन दिया कि फिल्म खत्म होने के बाद भी वे दर्शक की याद में बने रहे। किसी अभिनेता के लिए इससे बड़ी विरासत और क्या हो सकती है, कि हर व्यक्ति उसे हर किरदार में याद करे।