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नौकरीपेशा‌ दंपति

बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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दो वेतन आए,

पर सबसे बड़ी कमाई

वह शाम थी,

जब दोनों ने

एक-दूसरे की थकान पढ़ ली।

घर अब

किसी एक के कंधों पर नहीं,

दोनों की साझी साँसों पर टिका है।

सुबह की भाग-दौड़,

शाम की थकान-

प्रेम का सबसे सच्चा रूप

यहीं दिखाई देता है।

रोटी कमाने निकले

दोनों हाथ,

तो घर भी

दोनों के हाथों से ही

संवरना चाहिए।

पत्नी की नौकरी

सहायता नहीं,

उसकी पहचान है;

पति का सहयोग

उपकार नहीं,

साझेदारी है।

दोनों के पास

समय कम है,

फिर भी

एक-दूसरे के लिए

बचा हुआ समय ही

घर को घर बनाता है।

दफ़्तर से लौटकर

जब दोनों रसोई में मिलते हैं,

तभी समझ आता है-

प्रेम का सबसे सुंदर पता

बराबरी है।

वेतन-पर्चियों से नहीं,

ज़िम्मेदारियों के बराबर बँटवारे से

समृद्ध होते हैं

घर।

दोनों नौकरी करते हैं,

इसका अर्थ

दोहरी आय नहीं,

दोहरी ज़िम्मेदारी भी है।

सफल विवाह की पहचान

एक की कमाई नहीं,

दोनों के श्रम का

समान सम्मान है।