राधा गोयल
नई दिल्ली
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मुझे अपनी माँ की बहुत-सी बातें याद हैं। प्यार, हुनर, अक्लमंदी और सीख बहुत याद आती है। आज उन्हीं की शिक्षा के कारण हम ससुराल में अपने दायित्व को पूरी तरह से निभा पा रहे हैं। हमारी माँ को अपने सास-ससुर का प्यार कभी नहीं मिला। हमें कभी याद नहीं आता, कि हमें कभी दादा-दादी का प्यार नसीब हुआ हो। हम ३ बहनों का जन्म दादी के घर में हुआ, इसके बावजूद हमारी यादों में उनकी कोई याद नहीं है क्योंकि दादी माँ को इस बात के ताने मारती थीं कि हर समय धीओं (बेटियों) को जन्म देती है। बेटा तो इसकी किस्मत में है ही नहीं। पिताजी भी इस बात को सुनते रहते थे। दादी ने बेटियों को जन्म देने वाली को अपने साथ रखने से मना कर दिया। दादा जी का एक मकान कमला नगर में भी था। माँ, पिताजी और हम ३ बहनें उस घर में रहने लगे। हम ७ बहन-भाई हैं। ३ बहनों के बाद १ भाई का जन्म हुआ, किंतु ४९ घंटे ही जीवित रहा। १ भाई का २ साल बाद निधन हो गया।
दादा जी की एक बेटी गाँव में रहती थी। उसको शहर में बुला लिया और कमला नगर का आधा मकान उसके नाम कर दिया। यहाँ भी हमारी माँ चैन से नहीं जी पाईं। हमारी बुआ ने ताने मार कर, यह कहकर कर कि “बेटियों को जनती रहती है और बेटों को खा जाती है”, हमारी माँ का जीना हराम कर दिया। उसके बाद १ भाई, फिर १ बहन, २ भाई हुए लेकिन हमारी बुआ के ताने बंद नहीं हुए। बुआ के तानों के कारण माँ बेहद बीमार रहने लगीं। उपन्यास वगैरह पढ़ने में अपना काफी समय व्यतीत करने लगीं।
कहने को माँ केवल २ क्लास ही पढ़ी थीं, लेकिन इतनी अक्लमंद थीं कि स्नाकोत्तर पास को भी मात दे सकती थीं। पढ़ने की बहुत शौकीन थीं। हमारे यहाँ सभी साप्ताहिक, मासिक, त्रैमासिक व वार्षिक पत्रिकाएँ आती थीं। उसके अलावा हर महीने ‘कल्याण’ भी आता था। सरिता, गृहशोभा, कादंबिनी, चंदा मामा, शक्तिपुत्र, चंपक, नंदन, राजा भैया, वनिता, गुलशन नंदा और प्रेमचंद के उपन्यास आदि। हम बच्चों के लिए जासूसी उपन्यास ब्राजील के जंगलों में, टार्जन की कहानियाँ, कपालकुंडला, दुर्गेश नंदिनी, चंद्रकांता संतति के सभी अंश था। पिताजी भी पढ़ने के बहुत शौकीन थे। माँ घर के सारे काम करने के बावजूद भी बहुत किताबें पढ़ती थीं। सिलाई, कढ़ाई, बुनाई में भी बेहद दक्ष थीं। पाककला की इतनी निपुण थीं कि तरह-तरह के लाजवाब व्यंजन बनाती थीं।
हमारी एक मामी की मृत्यु हो गई थी। उनके ४ लड़के और ३ लड़कियाँ थीं। आठवीं संतान (पुत्री) को जन्म देने के समय उनकी मृत्यु हो गई थी। उस पुत्री को किसी ने गोद ले लिया था। मामा जी के बच्चों की देखभाल भी हमारी माँ के जिम्मे आ गई थी। वह घर का सारा काम निपटा कर मेरे छोटे भाई को साथ लेकर मामा जी के यहाँ जाती थीं। वहाँ का सारा काम निपटाती थीं।७ बच्चे मामा के और हम ७ बहन- भाइयों के लिए कपड़े सिलना, स्वेटर बनाना, बीमार पड़ने पर डाॅक्टर के पास ले जाना जैसे सारे काम माँ अकेले करती थीं।
जब हम चारों बहनों का विवाह हो गया तो छुट्टियों में हम चारों बहनें मायके जाती थीं। खाने-पीने की हमारे घर में कोई कमी नहीं थी। ढेर सारी मट्ठियाँ माँ बनाती थीं। माँ को तरह-तरह के अचार डालने का बहुत शौक था। छुट्टियों में हम सब बहनें व हमारे बच्चे इकट्ठे मायके में रहने जाते थे। माँ कम से कम २० किलो दूध की खीर बनाती थीं। ६ कनस्तर १० किलो वाले… घर का आटा और देसी घी घर से देकर अपने सामने बिस्किट बनवाती थीं। हम सब बहन-भाई एक ही बार में बैठकर आधा कनस्तर साफ कर जाते थे।
माँ कितनी अक्लमंद व दूरदर्शी थीं, उसके बारे में एक बात बताना चाहूँगी। मेरी बड़ी बहन को पोलियो हो गया था। वह तब हुआ था जब माँ दादी के घर में रहती थीं। मुझे तो बिल्कुल याद नहीं है, मैं बहुत छोटी थी। माँ के मुख से ही हमने सुना हुआ है कि जब वो अस्पताल जाती थीं तो मेरी छोटी बहन की इतनी बेकद्री होती थी जिसका कोई हिसाब नहीं है और माँ को गालियाँ भी खूब सुननी पड़ती थीं कि “लड़की जात की सेवा कर रही है। मरती है तो मरने दे, लड़की ही तो है,” लेकिन माँ ने ठान लिया था कि इसको ठीक करके रहूँगी। हमारी दादी का यह हाल तो तब था, जबकि उनकी खुद की ६ लड़कियाँ हैं। हमारे चाचा, ताऊ जी के पहले लड़के हुए तो उनकी पत्नियों को सम्मान मिला और हमारी माँ को हमेशा अपमान मिला।
मेरी पोलियोग्रस्त बहन का माँ ने पूरा इलाज कराया और उसको घर के सारे काम सिखाए। यहाँ तक की सिलाई भी सिखाई। मेरी बहन सिलाई में इतनी दक्ष थी कि वह पैण्ट तक भी सिल लेती थी। जब उसका विवाह हुआ तब माँ ने इस बात को छुपाया नहीं कि मेरी लड़की को बचपन में पोलियो हुआ था।उनकी सोच थी कि बाद में वह बेटी को छोड़ दें, उससे बेहतर है कि पहले ही सारी बात बता दी जाए। किसी परिचित ने रिश्ता बताया था। उसके घर में मेरी बहन को देखने- दिखाने का प्रोग्राम हुआ। माँ ने स्पष्ट कह दिया कि अपने सामने पहले खाना बनवाकर भी देख लो और सिलाई करवा कर भी देख लो।सोचो… कितना मुश्किल है कि ससुराल वाले सामने बैठे हों… उनके सामने खाना बनाना और सिलाई करना… लेकिन मेरी बहन ने खाना भी बनाया… उनके सामने पैण्ट काटी व थोड़ी सिलाई भी की। उन्हें तसल्ली करवा दी कि लड़की घर के सारे काम कर सकती है। मेरी बहन का दायाँ हाथ अपने आपसे ऊपर नहीं उठता था। बाएँ हाथ का सहारा देकर उठाना पड़ता था, लेकिन घर के सारे काम कर लेती थी। इतनी सुंदर थी कि यदि मैं अपनी बहन की मधुबाला से तुलना करूँ, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
हमारी माँ हम बेटियों को इसलिए नहीं पढ़ा पाईं, क्योंकि मेरे दादा- दादी इसके सख्त खिलाफ थे। माँ के मन में दादी का खौफ बहुत अधिक समाया हुआ था।
मुझे अपनी माँँ के और कई किस्से याद आ रहे हैं। माँ ने हमें घर के सभी काम यह कहकर सिखाए कि यदि ससुराल में करने पड़े तो कम से कम हम परेशान न हों कि मायके में जो काम नहीं किए वो ससुराल आकर करने पड़ रहे हैं।
एक बार का किस्सा याद आ रहा है। मेरे देवर की शादी थी। मेरी छोटी बेटी उस समय ढाई माह की थी। घर की सबसे बड़ी बहू होने के कारण मेरे ऊपर घर के काम की बहुत जिम्मेदारी थी। उस जमाने में नौकर-चाकर नहीं लगाए जाते थे। खासकर मेरे ससुराल में तो मतलब ही नहीं था, क्योंकि मेरे पति और मेरा देवर ही कमाते थे। देवर के विवाह के पश्चात ज्यादा भाग-दौड़ के कारण मुझे लगातार रक्तस्राव होता रहा जो रुकने का नाम नहीं ले रहा था। कई दिन तक तो बर्दाश्त किया, जब बर्दाश्त से बाहर हो गया तो अस्पताल में दिखाया। एक छोटा-सा ऑपरेशन करने की सलाह दी गई। यह होली के बाद की बात है। माँ मुझे अस्पताल में देखने आईं। पति से बच्चों का हाल-चाल पूछा। उन्होंने बताया कि सब ठीक है, बस पूनम उठती है और गिर जाती है। बुखार हो गया था तो शायद उससे बहुत कमजोरी हो गई है। तब तक माँ मेरे ससुराल में एक बार भी नहीं आईं थीं, लेकिन उस दिन वह मेरे पति के साथ मेरे ससुराल गईं। मैं अस्पताल में दाखिल थी। छोटी बेटी और बड़ी बेटी घर पर थीं। माँ ने अपनी नातिन को अपने पास आने के लिए आवाज लगाई। वो उठी और एकदम गिर पड़ी। माँ ने मुँह से कुछ नहीं कहा। बस मेरे पति को एक ही बात बोली कि इसे फौरन अस्पताल में दिखाओ। पति, मेरी माँ की बहुत इज्जत करते थे और करते हैं। माँ की बात मानकर उन्होंने बेटी को अस्पताल में दिखाया। पता लगा कि बेटी को पक्षाघात हुआ है। डॉक्टर ने कहा इसे कम से कम २० घंटे सुलाना है। मेरी ससुराल में तो इतनी जगह ही नहीं थी कि बेटी २० घंटे सो सके। मेरी माँ ने मेरी सास से डरते-डरते कहा कि “आप कहें तो मैं इन दोनों बच्चियों और इनकी माँ को अपने साथ ले जाऊँ ?” शुक्र है सास ने हामी भर दी, क्योंकि मेरे ससुराल में तो आने-जाने वालों का बेहद आवागमन रहता था और जब बच्ची बीमार है, जाहिर-सी बात है कि आने-जाने वालों का तांता ज्यादा लगा रहेगा, क्योंकि मेरी बड़ी बेटी सबकी बहुत लाड़ली थी। बड़ी प्यारी प्यारी बातें करके सबका मन मोह लेती थी। माँ की मेहनत और अक्लमंदी का ही नतीजा है कि मेरी बेटी ठीक हो गई।
यदि मेरी माँ समझदार नहीं होती तो आज मेरी बेटी शायद ठीक न होती।
माँ तुम्हारी हमेशा बहुत याद आती है। आज तुम और पिताजी तो नहीं रहे, लेकिन हम हर त्यौहार पर पहले की तरह अपने मायके जाते हैं। आज भी मैं मायके गई थी।
माँ को सबसे ज्यादा मैंने ही तंग किया। पाँचवीं तक पढ़ने के बाद आगे पढ़ने की जिद, जबकि बड़ी बहन ने पाँचवीं पास करने के बाद कोई जिद नहीं की। मैंने आठवीं कक्षा तक पढ़ने के बाद भी आगे पढ़ने की जिद की। १ महीने तक माँ व पिताजी को मनाती रही और पत्राचार माध्यम द्वारा पंजाब मैट्रिक की परीक्षा दी एवं पूरी दिल्ली में टाॅपर रही। फिर आगे पढ़ने की जिद… २ महीने तक उन्हें मनाने की कोशिश करती रही। माँ! तुम्हें मेरी जिद के आगे हार माननी पड़ी। मैंने फिर पत्राचार माध्यम द्वारा हायर सेकंडरी की परीक्षा दी और पूरी दिल्ली में प्रथम स्थान प्राप्त किया।माँ को उसके बदले में मेरी बुआ से कितने ताने सुनने को मिले। रोज- रोज के तानों से तंग आकर पिताजी ने अन्य जगह अपनी मेहनत के पैसों से मकान बनवाया। दादा जी को कह दिया कि पूरा मकान अपनी बेटी के नाम कर दें। माँ ने ही अपनी देख-रेख में वह मकान बनवाया।
आज हम सब बहनें माँ की दी हुई शिक्षा के कारण ही अपने ससुराल में सबकी चहेती बनी हुई हैं।