डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)
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प्रेम दया विश्वास से, सुंदर घर निर्माण।
कटु वाणी से टूटकर, बिखरे खुशियाँ प्राण॥
बचपन की मुस्कान से, महके गली सुहात।
मिल-जुल कर जब लोग हों, मुस्काए जज़्बात॥
सत्य मार्ग पर जो चला, नहीं डरा आघात।
संघर्षों से नित लड़े, फँसा नहींं जज़्बात॥
अहंकार के वृक्ष से, अंतस हो कमजोर।
समझ गिरा वह लक्ष्य पथ, उपहासित चहुँ ओर॥
काँच हृदय मत तोड़िए, जुड़ता नहीं दरार।
कटु शब्दों की चोट से, मर जाता व्यवहार॥
संत समागम पुण्यमय, बहता निर्मल नेह।
यदि आँगन में संत हों, खिल उठता है गेह॥
न्याय जहाँ निर्भीक हो, जग में बढ़ता मान।
अन्यायी का शीघ्र ही, मिट जाता अभिमान॥
दायित्वों का भार जो, हँसकर सदा निभाय।
उसके जीवन चमन में, सुयश खुशी मुस्काय॥
पीत पंख नभ छू रहे, डाली गाए राग।
नन्हा पंछी बाँटता, वन-उपवन अनुराग॥
हरित धरा की गोद में, बैठा सुख खग मीत।
मधुर चहक से जोड़ता, जीवन का संगीत॥
तजे सकल कटुता कलह, लोभ मोह मद क्रोध।
दया अहिंसा न्याय सच, मिटे क्षमा अवरोध॥
मीत रीति सद्नीति रस, बने चासनी प्रीत।
भीगे तन-मन माधुरी, मीत गीत नवनीत॥
प्रेम दया विश्वास से, हो विजयी संसार।
शील धीर गुण कर्म ही, रिद्धि-सिद्धि आधार॥
मानवीय संवेदना, करुणा चित्त अधीर।
पौरुषेय परहित विनत, हरे वेदना पीर॥
परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥