कुल पृष्ठ दर्शन : 2

बारिश बनी आफ़त

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

*************************************************

मई १९८३ की वह रात आज भी स्मृतियों में हूबहू जीवित है। अगले दिन बी.ए. ऑनर्स की परीक्षा थी। मैं पटना के राजेन्द्रनगर स्थित रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के ऑफिसर्स क्वार्टर में ट्यूशन पढ़ाकर लौट रहा था। हाथ में रात के भोजन का टिफिन था और मन में परीक्षा की तैयारी की चिंता। रात के लगभग साढ़े १० बजे थे। तभी मूसलाधार वर्षा ने पूरे शहर को जलमग्न कर दिया।
जब मैं मोइनुल हक स्टेडियम के पीछे राजेन्द्रनगर गोलम्बर के समीप पहुँचा, तब चारों ओर सड़कें किसी उफनती नदी का रूप ले चुकी थीं। १ किलोमीटर तक फैले चतुर्मुखी चौराहे पर इतना पानी भरा था कि सड़क और गहरे गड्ढे का कोई भेद ही नहीं रह गया था। अचानक मेरा एक पैर विशाल हौज में फँस गया। दूसरा पैर किसी प्रकार ऊपर टिक गया, किंतु शरीर का अधिकांश भाग पानी में डूब चुका था। तेज़ बहते पानी का वेग मुझे भीतर खींच रहा था।
मैंने पूरी शक्ति से सहायता के लिए पुकारा, पर उस घनघोर वर्षा और रात के सन्नाटे में मेरी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं था। एक क्षण को लगा कि जीवन की अंतिम घड़ियाँ सामने खड़ी हैं। मन में माता-पिता का स्मरण हुआ, अधूरी पढ़ाई की चिंता हुई और अनेक स्वप्न आँखों के सामने तैरने लगे, किन्तु उसी क्षण मैंने धैर्य नहीं खोया। भगवान का स्मरण करते हुए मैंने अपने टिके हुए पैर को मजबूती से ज़मीन पर जमाए रखा और संयमपूर्वक फँसे हुए पैर को धीरे-धीरे बाहर निकालने का प्रयास करता रहा। कुछ क्षण बाद, मानो ईश्वर ने स्वयं हाथ पकड़ लिया हो। मेरा फँसा हुआ पैर बाहर निकल आया। उस समय संतों की यह उक्ति पूर्णतः सत्य प्रतीत हुई— “जाकी राखे साईंयाँ, मार सके न कोय।”
भीगते, काँपते और बहते पानी से संघर्ष करते हुए मैं किसी प्रकार रात लगभग साढ़े ११ बजे सैदपुर छात्रावास पहुँचा। उस रात मैंने अनुभव किया, कि मनुष्य का साहस, धैर्य और ईश्वर पर अटूट विश्वास सबसे बड़ी शक्ति है।
आज जब उस घटना को स्मरण करता हूँ, तो लगता है कि यदि उस दिन ईश्वरीय कृपा साथ न होती, तो शायद आज आपके समक्ष न होता। संघर्षशील छात्रजीवन, आत्मनिर्भरता, शिक्षा के प्रति अडिग संकल्प और विपरीत परिस्थितियों में भी हार न मानने की प्रेरणा मुझे उसी भयावह वर्षा-रात्रि से मिली। वह बारिश केवल प्राकृतिक आपदा नहीं थी, बल्कि मेरे जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा भी थी, जिसने मुझे सिखाया कि साहस, संयम और विश्वास से असंभव प्रतीत होने वाले संकटों पर भी विजय पाई जा सकती है।

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥