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चले आना तुम

राधा गोयल
नई दिल्ली
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मेरे दोस्तों,
देखो ना 
मानव की धनलिप्सा ने 
किस तरह से सारे पेड़ काट डाले हैं,
तुमसे तुम्हारा घरौंदा छीन लिया 
हमसे हमारा घर छीन लिया,
सुनते हैं यहाँ विकास होगा
पर यहाँ कहाँ विकास नजर आ रहा है!
केवल पेड़ के कटे हुए तने पड़े हैं।

चलो मेरे साथ,
मैं तो बारिश से बचने के लिए इस पाइप में छिप जाती हूँ 
यहीं पर अपना बसेरा बसा लिया है, 
अब देखो ना 
पेड़ के पत्ते का छाता बनाकर
कोशिश तो कर रही हूँ,
कि तुम्हें बारिश से बचा लूँ 
पर कितना बचा लूँगी!
और खाना कहाँ से खाओगे ?

पर हाँ,
हम एक काम कर सकते हैं
जिससे तुम्हारे खाने का जुगाड़ भी हो जाएगा,
और मेरे खाने का भी।

चिड़िया रानी,
तुम तो दूर-दूर से दाने चुग कर लाती हो ना
अपना पेट भरने के बाद
थोड़े से दाने जगह-जगह डालना,
उससे कहीं ना कहीं तो पेड़ उग जाएंगे 
एक दो दाने यहाँ भी ले आना,
हम यहाँ उगा देंगे।

चूहे राजा,
तुम भी ऐसा ही करना 
हमारे पास कुदाल तो नहीं है,
लेकिन तुम्हारे दाँत किस दिन काम आएँगे 
अपने दाँतों से गढ्ढा खोद देना,
उसमें कुछ बीज दबा देना
कभी न कभी तो पेड़ उग ही जाएंगे, 
बंजर धरा को हरा-भरा करने के लिए 
हमारा छोटा-सा प्रयास ही बहुत बड़ा सिद्ध होगा,
शायद कोई बीज पेड़ बन जाए।

मेरा जीवन भी तो तुम्हारे जैसा ही हो गया है,
ओढ़ने को आकाश 
बिछाने को धरती,
खाने का ठौर-ठिकाना नहीं  
लेकिन मैंने अभी आशा नहीं छोड़ी है,
तुम भी उम्मीद का दामन थामे रखना
जैसे घूरे के दिन फिरते हैं,
कभी ना कभी हमारे भी दिन बहुरेंगे।
चले आना तुम सब,
एक नए निर्माण के लिए॥