सेवा में,
महानिदेशक,
नागर विमानन महानिदेशालय,
भारत सरकार, नई दिल्ली।
संयुक्त सचिव,
राजभाषा विभाग,
गृह मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली।
विषय:-नागर विमानन महानिदेशालय द्वारा जारी नीतिगत एवं विनियामक प्रारूपों को केवल अंग्रेजी में थोपने के विरोध में शिकायत।
महोदय,
उपर्युक्त विषय के अंतर्गत मैं आपका ध्यान नागर विमानन महानिदेशालय द्वारा जनसामान्य एवं हितधारकों से सुझाव एवं टिप्पणियाँ आमंत्रित करने हेतु जारी किए गए विभिन्न महत्वपूर्ण विनियामक प्रारूपों (मसौदों) की ओर आकृष्ट करना चाहता हूँ। अत्यंत क्षोभ का विषय है कि ये समस्त प्रारूप मात्र अंग्रेजी भाषा में प्रसारित किए गए हैं तथा इन पर टिप्पणियां भी मात्र अंग्रेजी में ही प्रेषित करने की बाध्यता परोक्ष रूप से थोपी जा रही है। यह भारत के ९५ प्रतिशत नागरिकों के साथ भाषाई भेदभाव तथा देश की राजभाषा का तीव्र अवमान है। यह कृत्य लोकतांत्रिक मूल्यों एवं संवैधानिक प्रावधानों की पूर्णतः अवहेलना करता है। किसी और लोकतांत्रिक देश में जनता पर अंग्रेजी नहीं थोपी जा रही है पर भारत में अंग्रेजी थोपने की प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है।
इसके अतिरिक्त पूर्व में भी कई प्रारूप, जैसे-नागरिक उड्डयन आवश्यकता अनुभाग – वायु सुरक्षा श्रृंखला ‘एफ’ भाग ६ अंक १, उड़ान सुरक्षा दस्तावेज़ प्रणाली की स्थापना के संबंध में टिप्पणियाँ आमंत्रित की गई थीं, जिसकी अंतिम तिथि १५ मई २०२६ तक सुश्री शिल्पी सेतिया, उप निदेशक वायु सुरक्षा (अणु डाक:Shilpy.dgca@nic.in) को भेजी जानी थी, साथ ही उड़ान प्रशिक्षण संगठनों के लिए मुख्य उड़ान प्रशिक्षक, नामित परीक्षक, उप मुख्य उड़ान प्रशिक्षक और गैर-उड़ान सीएफआई की स्वीकृति के मानदंडों से संबंधित सीएआर धारा ७ श्रृंखला १ भाग ५ (संशोधन-९) के मसौदा संशोधन पर टिप्पणियाँ १० मई २०२६ तक रविंद्र कुमार, निदेशक (संचालन) (विद्युत डाक:ravind ra81.dgca@gov.in) को प्रेषित की जानी थीं। ये सभी भी केवल अंग्रेजी में ही विचारार्थ रखे गए थे।

विधिक एवं विनियामक उल्लंघन:-
यह संपूर्ण प्रक्रिया राजभाषा अधिनियम, १९६३ की धारा ३ (३) का खुला उल्लंघन है, जिसके अनुसार भारत सरकार के मंत्रालयों, विभागों और कार्यालयों द्वारा जारी किए जाने वाले संकल्प, सामान्य आदेश, नियम, अधिसूचनाएं, प्रशासनिक या अन्य प्रतिवेदन द्विभाषी रूप में होने अनिवार्य हैं। इसके अतिरिक्त यह राजभाषा नियम, १९७६ के नियम ११ की भी पूर्ण अवहेलना है, जो यह अनिवार्य करता है कि सभी नियम, विनियम एवं प्रशासनिक प्रतिवेदन द्विभाषी रूप में होने चाहिए।

द्विभाषी का वास्तविक अर्थ:-
यहाँ ‘द्विभाषी’ का अर्थ भली-भांति समझना आवश्यक है। तात्पर्य यह है कि दोनों भाषाओं (हिन्दी और अंग्रेजी) का उपयोग एक ही दस्तावेज़ (प्रारूप) के अंतर्गत अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद (पैरा-दर-पैरा) समानांतर रूप से किया जाना अनिवार्य है। मूल प्रारूप को केवल अंग्रेजी में जारी कर देना और उत्तरवर्ती समय में उसका हिन्दी अनुवाद प्रसारित करना राजभाषा नीति का स्पष्ट उल्लंघन है। ऐसा करके नागरिकों पर अंग्रेजी थोपने का प्रयास किया जा रहा है, जो तत्काल प्रभाव से बंद होना चाहिए।
अतः, नागर विमानन महानिदेशालय तथा राजभाषा विभाग से सविनय आग्रह है, कि जिन प्रारूपों के संबंध में अभी अंतिम दिनांक समाप्त नहीं हुआ है, उनके वर्तमान मसौदों को अविलंब रोक दिया जाए। इन सभी मसौदों को एकसाथ पूर्णतः द्विभाषी (हिन्दी एवं अंग्रेजी में अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद) रूप में पुनः जारी किया जाए। देश के नागरिकों को हिन्दी भाषा में भी अपने सुझाव एवं टिप्पणियाँ प्रस्तुत करने की पूर्ण अनुमति प्रदान की जाए।
इस विसंगति के परिमार्जन हेतु अविलंब एक आधिकारिक शुद्धि पत्र जारी किया जाए और सुझाव जमा करने की अंतिम तिथियों को आगे बढ़ाया जाए, ताकि हिन्दी भाषी नागरिकों को पर्याप्त अवसर प्राप्त हो सके।
इनकी अंग्रेजी वेबसाइट पर महानिदेशक वीर विक्रम यादव हैं, पर हिन्दी वेबसाइट पर महानिदेशक फैज अहमद किदवई हैं, यह बेशर्मी भरी लापरवाही है जो अस्वीकार्य है। वेबसाइटों को जब तक छपे हुए पत्रक की तरह ऊपर नीचे के प्रारूप में हिन्दी-अंग्रेजी में वास्तविक रूप से द्विभाषी नहीं बनाया जाएगा, यही समस्या बनी रहेगी क्योंकि विभाग हिन्दी वेबसाइटों को अद्यतित करना ही नहीं चाहते हैं इसलिए हिन्दी और अंग्रेजी वेबसाइटों के दस्तावेज और आँकड़े तथा विवरण अलग-२ होते हैं।
संवैधानिक मर्यादा और राजभाषा के सम्मान की रक्षा हेतु इस विषय पर त्वरित एवं प्रभावी कार्यवाही की अपेक्षा है।
भवदीय-
अभिषेक कुमार
रायसेन (मध्यप्रदेश)
प्रतिलिपि:
गृह मंत्री, भारत सरकार।
सचिव, राजभाषा विभाग, भारत सरकार।
सचिव, संसदीय राजभाषा समिति।
(सौजन्य:वैश्विक हिन्दी सम्मेलन, मुम्बई)