ललित गर्ग
दिल्ली
***********************************
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक यह है, कि जिस देश में महिलाओं को ‘शक्ति’, ‘मातृशक्ति’ और ‘आधी दुनिया’ कहकर सम्मानित किया जाता है, वहीं राजनीति में उन्हें समान भागीदारी देने के प्रश्न पर लगभग सभी राजनीतिक दलों की नीयत संदिग्ध दिखाई देती है। संसद से लेकर चुनावी मंचों तक महिला आरक्षण के समर्थन में बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जब टिकट देने का समय आता है, तब अधिकांश दल महिलाओं को हाशिए पर धकेल देते हैं। हालिया विधानसभा चुनावों ने इस विरोधाभास को एक बार फिर उजागर कर दिया है। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पुडुचेरी के विधानसभा चुनावों में राजनीतिक दलों द्वारा महिलाओं को दिए गए टिकटों का आंकड़ा यह बताने के लिए पर्याप्त है, कि महिला प्रतिनिधित्व को लेकर दलों की कथनी और करनी में कितना बड़ा अंतर है। महिला आरक्षण विधेयक को लेकर संसद में जोरदार राजनीतिक संघर्ष देखने को मिला, लेकिन उन्हीं दलों ने चुनावी मैदान में महिलाओं को पर्याप्त अवसर देने में उत्साह नहीं दिखाया। यह केवल राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक नैतिकता का भी प्रश्न है।
सबसे अधिक चर्चा पश्चिम बंगाल चुनाव की रही। भारतीय जनता पार्टी ने २९४ सीटों में से केवल लगभग ३३ महिलाओं को टिकट दिए, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने २९१ सीटों पर करीब ५२ महिलाओं को उम्मीदवार बनाया। यह संख्या कुल टिकटों का लगभग १० प्रतिशत ही है। तमिलनाडु में भी स्थिति बहुत अलग नहीं रही। सत्ता परिवर्तन के दावे करने वाले दलों ने महिलाओं को सीमित अवसर दिए। असम और केरल जैसे राज्यों में भी राजनीतिक दलों ने महिलाओं को प्रतीकात्मक उपस्थिति से आगे नहीं बढ़ने दिया। परिणाम यह हुआ, कि कुल निर्वाचित प्रतिनिधियों में महिलाओं की संख्या अत्यंत कम रही। यह स्थिति तब है, जब देश की लगभग आधी आबादी महिलाएं हैं। दरअसल भारतीय राजनीति लंबे समय से पुरुष प्रधान मानसिकता से संचालित होती रही है। राजनीतिक दल महिलाओं को अक्सर ‘सुरक्षित या ‘कमजोर’ उम्मीदवार मानते हैं। उन्हें यह भय रहता है कि महिला प्रत्याशी चुनावी संघर्ष, धनबल, बाहुबल और जातीय समीकरणों के बीच प्रभावी प्रदर्शन नहीं कर पाएंगी। यही कारण है, कि अधिकांश दल महिलाओं को उन्हीं सीटों पर टिकट देते हैं जहां उनकी जीत की संभावना कम होती है या जहां केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति दर्ज करानी होती है।
विडंबना यह भी है कि जो राजनीतिक दल अपने संगठनात्मक ढांचे में भी महिलाओं को निर्णायक स्थान देने से बचते हैं। अधिकांश राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के शीर्ष नेतृत्व पर पुरुषों का वर्चस्व है। महिलाओं को प्रायः महिला मोर्चा, सांस्कृतिक कार्यक्रम या सामाजिक अभियानों तक सीमित कर दिया जाता है। निर्णय लेने वाली समितियों और रणनीतिक पदों पर उनकी भागीदारी बेहद कम दिखाई देती है। महिला आरक्षण विधेयक को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने विशेष सत्र बुलाकर राजनीतिक संदेश देने का प्रयास किया था। विपक्ष पर महिलाओं के हितों की अनदेखी का आरोप लगाया गया, लेकिन सवाल यह है कि यदि वास्तव में महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण को लेकर गंभीर इच्छाशक्ति होती, तो बिना किसी संवैधानिक बाध्यता के भी दल अपने स्तर पर अधिक महिलाओं को टिकट दे सकते थे। आखिर किसने रोका था कि भाजपा, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक या अन्य दल को, कम से कम ३३ प्रतिशत महिलाओं को उम्मीदवार तो बनाते।
हालांकि, यह भी स्वीकार करना होगा कि राजनीति में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी लोकतंत्र को अधिक संवेदनशील और मानवीय बना सकती है। विश्व के अनेक देशों के अनुभव हैं कि जहां महिलाओं की राजनीतिक उपस्थिति बढ़ी है, वहां शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, जल संरक्षण, बाल सुरक्षा व सामाजिक कल्याण जैसे विषयों को अधिक प्राथमिकता मिली है। भारत में पंचायत स्तर पर महिला आरक्षण के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। अनेक महिला सरपंचों और जनप्रतिनिधियों ने गांवों में शिक्षा, स्वच्छता और महिला सुरक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। इनकी भागीदारी का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे लोकतंत्र अधिक समावेशी बनता है। महिलाओं की उपस्थिति केवल संख्या का प्रश्न नहीं, बल्कि दृष्टिकोण का भी प्रश्न है। महिलाएं समाज के उन अनुभवों और समस्याओं को सामने लाती हैं, जिन्हें पुरुष प्रधान राजनीति अक्सर नजरअंदाज कर देती है। घरेलू हिंसा, मातृत्व स्वास्थ्य, कार्यस्थल सुरक्षा, बालिका शिक्षा और लैंगिक समानता जैसे मुद्दों को मजबूती तभी मिलती है, जब निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी हो।
दूसरी ओर कुछ चुनौतियाँ भी हैं, जिनकी चर्चा आवश्यक है। कई बार दल केवल औपचारिकता निभाने के लिए महिलाओं को टिकट देते हैं। राजनीति में वंशवाद और परिवारवाद के कारण भी कई योग्य महिलाएं अवसर से वंचित रह जाती हैं, जबकि राजनीतिक परिवारों से जुड़ी महिलाओं को अपेक्षाकृत आसान प्रवेश मिल जाता है। इसलिए केवल आरक्षण पर्याप्त नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रशिक्षण, आत्मनिर्भरता और स्वतंत्र नेतृत्व क्षमता का विकास भी आवश्यक है। एक अन्य चुनौती चुनावी राजनीति का बढ़ता अपराधीकरण और अत्यधिक खर्च है। भारतीय राजनीति में चुनाव लड़ना अत्यंत महंगा और संघर्षपूर्ण हो गया है। धनबल और बाहुबल की संस्कृति महिलाओं की भागीदारी को सीमित करती है। सामाजिक रूढ़ियाँ भी बड़ी बाधा हैं। आज भी अनेक परिवार राजनीति को महिलाओं के लिए ‘उपयुक्त क्षेत्र’ नहीं मानते। देर रात की राजनीतिक गतिविधियाँ, सार्वजनिक आलोचना और चरित्र हनन की आशंकाएं भी महिलाओं को राजनीति से दूर करती हैं।
सवाल यह भी है कि क्या केवल आरक्षण से समस्या हल हो जाएगी ? संभवतः नहीं। आरक्षण एक आवश्यक शुरुआत हो सकता है, लेकिन इसके साथ सामाजिक सोच में परिवर्तन भी जरूरी है। राजनीतिक दलों को उन्हें केवल चुनावी पोस्टर या प्रचार अभियान तक सीमित रखने की प्रवृत्ति बदलनी होगी। राजनीतिक प्रशिक्षण शिविर, आर्थिक सहयोग और सुरक्षित राजनीतिक वातावरण तैयार करना भी आवश्यक है। आज आवश्यकता इस बात की है कि महिला प्रतिनिधित्व को दया, उपकार या राजनीतिक मजबूरी के रूप में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में देखा जाए। जब तक राजनीतिक दल स्वेच्छा से महिलाओं को पर्याप्त अवसर नहीं देंगे, तब तक लोकतंत्र का संतुलन अधूरा रहेगा।
यदि आधी आबादी निर्णय प्रक्रिया से बाहर रहेगी, तो लोकतंत्र भी आधा-अधूरा ही रहेगा। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि महिला सशक्तीकरण केवल भाषणों और घोषणाओं से नहीं आएगा, बल्कि वास्तविक प्रतिनिधित्व और समान अवसरों से आएगा। कथनी और करनी के इस अंतर को समाप्त किए बिना महिला आरक्षण का सपना अधूरा ही रहेगा।