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राष्ट्रीय चेतना की दृष्टि से ‘जनकनंदिनी’ अद्वितीय कृति

वाराणसी (उप्र)।

‘जनकनंदिनी’ प्रबंध काव्य एक उच्च कोटि की रचना है, जिसकी मूल कथा रामायणीय होते हुए भी सम-सामयिक जीवन पद्धति को प्रभावित करती है। पारंपरिक छंदों के प्रयोग ने इस काव्य की विशेषता को और बढ़ा दिया है। प्रतीकों और अलंकार की छटा व  राष्ट्रीय चेतना की दृष्टि से यह अद्वितीय कृति है।
    यह बात ‘मधुकर’ रचित ‘जनकनन्दिनी’ महाकाव्य का लोकार्पण करते हुए समारोह के अध्यक्ष प्रो. राजा राम शुक्ल ने कही। कवितंबरा और हिंदी शोध संवर्द्धन अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में हीरालाल मिश्र ‘मधुकर’ रचित उक्त काव्य की मुख्य अतिथि प्रो. कल्पलता पाण्डेय ने कहा कि ‘जनकनंदिनी’ में वर्णित राम का सीता के प्रति प्रेम, राजा के दायित्व एवं कर्तव्य तथा नारी के प्रति समाज की दृष्टि आदि का ‘मधुकर’ ने विस्तार से उल्लेख किया है।

 प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. रामसुधर सिंह ने कहा कि ‘मधुकर’ ने महाकाव्य के १५ सर्गों में सीता के उदात्त, त्यागमय और लोकहित कारिणी व्यक्तित्व को अत्यंत प्रवाहमय छंदों में वर्णित किया है।
विशिष्ट अतिथि प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी और प्रमुख कवि डॉ. संजय पंकज एवं प्रो. शीतला प्रसाद दुबे ने भी विचार व्यक्त किए।
      इस अवसर पर बड़ी संख्या में साहित्यकार उपस्थित रहे।