बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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भीड़ में खड़े लोग,
अक्सर भरोसे की बातें करते हैं
वे कहते हैं—
“हम तुम्हारे साथ हैं।”
लेकिन यह साथ,
सिर्फ शब्दों की सतह पर ठहरा रहता है
जब जीवन की सड़क,
अचानक पत्थरों से भर जाती है।
जब भीतर का साहस,
धीरे-धीरे टूटने लगता है
तब वही लोग,
अपनी आँखें दूसरी ओर मोड़ लेते हैं।
दु:ख के समय,
सबसे अधिक सुनाई देती है
चुप्पी
वह चुप्पी,
जो रिश्तों के असली अर्थ खोल देती है।
समाज को,
दूर से संवेदनाएँ व्यक्त करना आता है
पर किसी के संघर्ष में उतरना,
उसे कठिन लगता है।
वह सलाह देता है,
सहानुभूति के वाक्य बोलता है
लेकिन अपने हाथ,
पीछे खींच लेता है।
एक व्यक्ति
जब अकेले संघर्ष करता है,
तब उसे समझ आता है
कि दुनिया में
सबसे मजबूत सहारा,
अपना आत्मबल होता है।
फिर भी मन,
हर बार उम्मीद करता है
कि शायद इस बार,
कोई सचमुच साथ चलेगा
कोई बिना शर्त,
कंधे पर हाथ रखेगा।
लेकिन समय,
धीरे से यह सिखा देता है
कि शब्दों से भरे समाज में,
सच्चा साथ
बहुत कम लोगों के भीतर बचा है॥