दिल्ली।
आलोचक सर्वश्रेष्ठ को पहचान कर रेखांकित करता है, जो यह नहीं कर सकता, वह आलोचक नहीं हो सकता। कविता के नए प्रतिमान इस बात का सर्वोतम उदाहरण हैं कि अच्छी कविता को किस तरह पहचाना जाए। नामवर जी अपनी आलोचना में साहित्य और समाज को इसी तरह जोड़कर देखते थे, इसलिए वे अपने समय के सबसे महान आलोचक माने गए।
प्रसिद्ध कवि अरुण कमल ने अपने बीज वक्तव्य में यह बात कही। मौका रहा हिंदू कॉलेज के हिंदी विभाग द्वारा प्रख्यात आलोचक प्रो. नामवर सिंह की जन्म शताब्दी के अवसर पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी का, जिसका मुख्य उद्देश्य प्रो. सिंह के आलोचनात्मक योगदान और उनके वैचारिक सफर पर चर्चा था। उद्घाटन सत्र में प्राचार्य प्रो. अंजू श्रीवास्तव ने कालेज से प्रो. सिंह के जुड़ाव की स्मृतियाँ साझा की।
अतिथियों ने प्रो. रचना सिंह द्वारा संपादित कृति ‘विस्तार का वैभव’ का लोकार्पण किया। सत्र में विभाग प्रभारी प्रो. विमलेन्दु तीर्थंकर ने अतिथियों का स्वागत किया।
दूसरे सत्र में ‘आलोचना का सौंदर्य शास्त्र और प्रो. नामवर सिंह’ पर दिल्ली विवि के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. गोपेश्वर सिंह और प्रो. सुधीर रंजन सिंह ने प्रो. नामवर के प्रदाय को विस्तार से रेखांकित करते हुए उनके मौलिक चिंतन को बताया। काशी हिन्दू विवि के प्रो. आशीष त्रिपाठी, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. शम्भू गुप्त, प्रो. संजीव कुमार, डॉ. वैभव सिंह व प्रो. रामेश्वर राय ने भी सारगर्चित संवाद किया।
समापन सत्र के मुख्य वक्ता प्रो. नामवर के शिष्य और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. महेंद्र पाल ने अपने विद्यार्थी जीवन के अनेक संस्मरण सुनाए और स्मृतियों को साझा किया।
संगोष्ठी संयोजक डॉ. नीलम सिंह ने सभी का आभार व्यक्त किया।