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कुछ ना कह सका

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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आँखों में शब्दों को भरकर, होंठों तक भावों को लाया,
धड़कन थम-सी गई अनहोनी, स्वर ख़ुद को भीतर रुकवाया
मन का दीप जलाकर भीतर, अनकही विचारों की पीड़ा,
चुप्पी की ओटों में रखकर, जो यथार्थ सच दफ़नाया।

मन कहने को बहुत सँजोया, दशा-दिशा पल भर में तोड़ा,
डर ने राहों रोक दिया तो, आगे कदम सही पथ से मोड़ा
नज़र मिली तो क्षण भर समझें, रखी लाज नैतिकता रेखा,
मुस्कानों के पर्दे में छिप, प्रवाहित आँसू हृदय छुपाया।

दिल की बात उठाकर देखा, भावों को होंठों तक लाया,
हिम्मत साथ न दे पाई तो, स्वर अन्तर्मन में ही रोया
तू समक्ष थी मेरी सम्मति, साँसें ठिठकीं जब समय थमा,
खामोशी का चोला ओढ़े, नकली खुशियाँ सत्य छुपाया।

तभी वक़्त ने मौका पकड़ा, हृदय भाव हाथों से छीना,
आज को कल पर टाल दिया, पौरुष सच का पीछे छूटा
पल की देरी भारी पड़ती, बढ़ी उम्र की दूरी सीमा,
अनकहे शब्दों का बोझ तले, दब सीने में मातम ढोया।

यादों की गलियों में चलकर, ख़ुद से अहं भाव टकराया,
सीखे सबक समेट विचारों, हियतल ने मन को समझाया।
जो कहना है आज कहो दिल, कल का आगम किसे भरोसा,
टाल-मटोल की आदत छोड़, वर्तमान पथ साथ निभाया॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥