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प्रेम की होली

दीप्ति खरे
मंडला (मध्यप्रदेश)
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होली विशेष…

होली केवल उत्सव नहीं,
यह तो है अनुराग की बोली
बैर-भाव भूल खुशियाँ मनाएँ,
रंग उड़ाएँ, करें हँसी-ठिठोली।

रंगों से भीगी यह धरती,
नहीं आज मन में कोई मलाल
बहता जैसे उत्सव का सागर,
चहुँ दिशि उड़ता अबीर गुलाल।

लाल, गुलाबी, नीला, पीला,
रंग नहीं ये हैं भावों की भाषा
बैर-भाव को भूल आज सब,
बोलें केवल प्रेम की भाषा।

क्यों न हम भी रंग दें मन को,
प्रेम प्यार के पावन रंग में।
अपनेपन का रंग चढ़े ऐसे,
जो छूटे न जीवन भर में॥