डॉ. शैलेश शुक्ला
बेल्लारी (कर्नाटक)
****************************************
बुधिया के गाँव में सरकारी योजनाएं आईं- राशन, गैस, बिजली बिल माफी, नकद। बुधिया खुश था।
पहले साल उसने काम छोड़ा।
“मिल तो रहा है।”
दूसरे साल उसने खेत पड़ोसी को दे दिया।
“मेहनत किसलिए ?”
तीसरे साल उसके बेटे ने विद्यालय छोड़ा।
“पढ़कर क्या करेंगे, फ़्री में सब मिलेगा।”
पाँच साल बाद चुनाव आए। नेताजी गाँव में आए।
“इस बार और देंगे- मोबाइल, साइकिल, पचास हज़ार नकद।”
“और काम ?” किसी ने पूछा।
“काम ? वो तुम करोगे तो हम देंगे क्यों ?”
बुधिया ने ताली बजाई, पर उसके हाथ अब उतने मजबूत नहीं थे-पाँच साल की बेकारी ने उन्हें ढीला कर दिया था।