डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)
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सन् २०२० से २०२१ का वह कालखंड मानव इतिहास के सबसे भयावह और त्रासद समयों में से एक बनकर मेरी स्मृतियों में अंकित हो गया है। दिल्ली जैसे महानगर में रहते हुए मैंने जो देखा, वह केवल एक महामारी नहीं थी-वह जीवन, व्यवस्था और मानवीय संवेदनाओं की कठोर परीक्षा थी।
सब-कुछ अचानक थम गया था। सड़कें सूनी, बाज़ार बंद, रेल, बस, हवाई जहाज़ सब रुक गए थे। ऐसा लगता था-जैसे समय ने स्वयं को स्थिर कर लिया हो। इसी भयावह दौर में मेरा मोटरसाइकिल से एक्सीडेंट हो गया। दर्द से कराहते हुए मुझे वसंत कुंज स्थित इंडियन स्पाइनल इंज्यूरिज सेंटर तक मात्र पचास किलोमीटर की दूरी तय करना भी किसी युद्ध से कम नहीं था। ‘तालाबंदी’ के कारण रास्ते सुनसान थे, हर मोड़ पर पुलिस और सुरक्षाकर्मियों की तैनाती थी, और मन में भय-क्या मैं अस्पताल तक सुरक्षित पहुँच पाऊँगा ?
अस्पताल पहुँचने के बाद भी स्थिति सहज नहीं थी। हर ओर मॉस्क, पीपीई किट और सैनिटाइज़र का अभाव स्पष्ट दिखता था। चिकित्सक, नर्स और कम्पाउंडर दिन-रात अपनी जान जोखिम में डालकर मरीजों की सेवा कर रहे थे। कई बार यह समाचार भी सुनने को मिलता, कि सेवा करते-करते कोई स्वास्थ्यकर्मी स्वयं ही ‘कोरोना’ का शिकार हो गया।
घर में भी स्थिति विचित्र थी। परिवार के सदस्य होते हुए भी हम एक-दूसरे से दूरी बनाए रखते थे। अपनों के बीच भी एक अदृश्य दीवार खड़ी हो गई थी। हर क्षण मन में यह डर रहता-कहीं कोई संक्रमित न हो जाए, कहीं यह बीमारी घर में प्रवेश न कर जाए।
शिक्षा व्यवस्था भी पूरी तरह बदल गई थी। विद्यालय और महाविद्यालय बंद थे, परन्तु शिक्षा को रोकना संभव नहीं था। मैंने ऑनलाइन कक्षा लेना शुरू किया, फेसबुक के माध्यम से सजीव पढ़ाना पड़ा। छात्रों से सीधा संवाद टूट चुका था, परन्तु तकनीक ही एकमात्र सहारा थी। परीक्षा की प्रक्रिया भी बाधित हो गई-दसवीं और बारहवीं के परिणाम बिना परीक्षा के घोषित किए गए। यह सब मेरे लिए एक नए अनुभव के साथ-साथ एक गहरी चिंता का विषय भी था।
सबसे अधिक हृदय विदारक दृश्य थे-मौतों के आँकड़े और लावारिस लाशें। लाखों-करोड़ों लोग इस महामारी की भेंट चढ़ गए। कई शवों की पहचान तक नहीं हो पाती थी। सामूहिक रूप से अंतिम संस्कार किए जाते थे-मानो इंसान की पहचान भी इस संकट में खो गई हो। श्मशानों में जलती चिताएँ, अस्पतालों के बाहर लम्बी कतारें, और हर चेहरे पर भय व असहायता-यह सब आज भी रोंगटे खड़े कर देता है।
शादी-विवाह, उत्सव, रोजगार-सब कुछ ठहर गया था। फैक्ट्रियाँ बंद, मजदूर बेरोजगार, और हर व्यक्ति अपने ही घर में कैद था। अकेलापन, मानसिक तनाव और मृत्यु का भय-इन सबने जीवन को बोझिल बना दिया था।
ओ कोरोना काल! तुमने हमें बहुत कुछ सिखाया-संयम, धैर्य और जीवन के वास्तविक मूल्य का बोध, परन्तु तुम्हारी पीड़ा और त्रासदी को भुला पाना संभव नहीं। यह संस्मरण केवल एक याद नहीं, बल्कि उस दौर का जीवंत साक्ष्य है, जब मानवता ने अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष किया।
परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥