पटना (बिहार)।
कवि यदि लिखें, तो वह सचमुच कविता हो-संवेदना, लय और संप्रेषणीयता से युक्त, न कि मात्र सपाट गद्य का विस्तार। इसी शून्य का लाभ आज गीत, ग़ज़ल, आज़ाद ग़ज़ल और दोहा लिखने वाले रचनाकार उठा रहे हैं। सच तो यह है कि इन्हीं विधाओं ने कविता को आमजन के बीच जीवित बनाए रखा है।
यह विचार साप्ताहिक अंक ‘सिद्धेश्वर की डायरी’ प्रस्तुत करते हुए कवि सिद्धेश्वर ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हरिवंश राय बच्चन की ‘मधुशाला’, गोपालदास ‘नीरज’ की गीतधारा, गुलज़ार की सहज अभिव्यक्ति और दुष्यंत कुमार की जनपक्षधर ग़ज़लें आज भी पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि पाठक कविता से दूर नहीं हुआ है, बल्कि वह सच्ची, सरल और हृदयग्राही कविता की तलाश में है।