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सच्चाई

दीप्ति खरे
मंडला (मध्यप्रदेश)
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झूठ का नकाब उतारा तो,
असली चेहरे दिखने लगे
जिन्हें हमने समझा अपना,
हमसे ही नजरें चुराने लगे।

नये ज़माने की दौड़ में,
अपनों को पीछे छोड़ दिया
जिससे मिले फायदा,
बस वही अपने लगने लगे।

भावनाएं सबकी मर चुकी,
संवेदनाएं ख़त्म हो गईं
दान देने से ज्यादा लोग,
दान का दिखावा करने लगे।

परिवार से हुआ करती थी,
रौनक घर की
घर-परिवार को छोड़ लोग
पत्थर से घर सजाने लगे।

पढ़े-लिखे लोगों की,
तरक्की का असर देखो।
बच्चे आया के भरोसे,
और डागी (कुत्ते) गोद में पलने लगे॥