बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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भारतीय सेना… (‘आपरेशन सिंदूर’ दिवस विशेष)….
देश तभी होता सुरक्षित है,
जब त्याग घर-घर जलता है
एक सैनिक सीमा पर रहता है,
पीछे पिघलता पूरा परिवार है।
ऑपरेशन ‘सिंदूर’ केवल,
सीमा का अभियान नहीं था
यह नारी के साहस की कहानी,
मौन और गंभीर गीत था।
सीमा पर जब उड़ी थी धूल,
आकाश में बारूद भरा था
धरती ने सुना था चुपचाप,
कैसे युद्ध का शोर बढ़ा था।
मंदिर में बैठी थी माँ,
दीपक की लौ देख रही थी
सलामती अपने बेटे की माँ,
हर पल ईश्वर से मांग रही थी।
बड़े प्यार से बेटा पाला था,
आँचल की ठंडी छाया में
अब वही बेटा खड़ा हुआ था,
देश बचाने हर हालत में।
सबसे गहरी पीड़ा माँ के,
उन घरों में जाग रही थी
जहाँ माँ की आँखों में,
सारी रात नमी ठहरी थी।
ऑपरेशन ‘सिंदूर’ केवल,
एक अभियान नहीं था
यह हर नारी के साहस का,
धैर्य और हिम्मत परीक्षण था।
एक पत्नी चुपचाप खड़ी थी,
माथे पर सिंदूर सजा था
उसके भीतर गर्व और साहस,
का सुंदर समंदर बसा था।
वह जानती थी लौटेगा जब,
घर में फिर उजियारा होगा
बहन, माँ की खुशी बढ़ेगी,
देश को उस पर गर्व होगा।
किसी बहन ने राखी बाँधी,
हाथ अभी भी काँप रहे थे
भाई के जाने के बाद,
सूने आँगन में रोते थे।
बहन की आँखों में बचपन था,
अच्छे सपनों की खुशबू थी
पर युद्ध की कठोर हवा में,
हर मुस्कान कहीं गुम हुई थी।
माताओं के धैर्य को सलाम,
जिसने बेटे देश को सौंपे
जो बहनें चुपचाप रो रही थीं,
उनके टूटे मन को प्रणाम।
और किसी स्त्री का सिंदूर,
केवल माथे की लाली नहीं।
उसके प्रतीक्षा, विश्वास की,
बराबरी कोई कर सकता नहीं॥