कुल पृष्ठ दर्शन : 1

श्रम की गरिमा और समाज की संवेदना

बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
*****************************************

मौन संघर्ष, हाथों में छाले, सम्मान कब ? (मजदूर दिवस विशेष)….

यदि हम मानवता के विकास का इतिहास देखते हैं तो एक सत्य निकाल कर सामने आता है कि संसार की प्रत्येक भव्य इमारत व प्रत्येक विकसित नगर और प्रत्येक सुविधा के पीछे मजदूरों का श्रम छिपा हुआ है। 
समाज का निर्माण केवल नीतियों से नहीं किया जा सकता, बल्कि उन कठोर हाथों से होता है जिनमें मेहनत के छाले होते हैं, परंतु जो वर्ग समाज की नींव तैयार करता है, वही वर्ग समाज में सबसे अधिक उपेक्षित दिखाई देता है।
 मजदूर दिवस को केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं माना जाए, बल्कि मौन संघर्षों को याद करने के अवसर के रूप में मनाया जाए।
मजदूर ही है, जो अपने श्रम से समाज को गति प्रदान करता है व किसान खेतों में अन्न उगाता है। भवन निर्माण में लगे श्रमिक तथा अन्य श्रमजीवी वर्ग सभी राष्ट्र निर्माण के वास्तविक आधार हैं। 
इनके बिना विकास की कल्पना अधूरी है। फिर भी समाज में इन्हें वह सम्मान नहीं मिल पाता, जिसके वे वास्तविक अधिकारी हैं।
मजदूरों का प्रत्येक दिन श्रम से आरंभ होता है और उसकी समाप्ति थकान से होती है। सुबह सूरज उगने से पहले वह काम पर निकल जाता है और देर शाम तक वह उस काम पर अपनी सारी शक्ति लगा देता है। चाहे कितनी भी विपरीत परिस्थितियाँ आएँ, उसके कार्य को रोक नहीं पातीं। उसके हाथों में  छाले पड़ जाते हैं, वह कठिन शारीरिक श्रम करता है व कठिन परिस्थितियों के दौर से गुजरता है।
   समाज का एक उच्च वर्ग, जो वातानुकूलित कमरों में बैठकर  योजनाएँ बनाता है, किंतु उन योजनाओं को वास्तविकता में बदलने का कार्य मजदूर ही करता है। 
  बड़े-बड़े भवनों की चमक के पीछे मजदूरों का पसीना होता है, परंतु उद्घाटन के समय उसका नाम कहीं दिखाई नहीं देता। वह इतने बड़े-बड़े निर्माण कार्य करता है, पर स्वयं जीवनभर झोपड़ियों में रहता है। वह दूसरों के लिए सुख-सुविधाएँ तैयार करता है, पर उसके अपने जीवन में अभाव रहता हैं।
मजदूर की समाज द्वारा भी उपेक्षा की जाती है। समाज द्वारा उनको सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता।
श्रमिक वर्ग को निम्न समझने की मानसिकता आज भी अनेक स्थानों पर दिखाई देती है, जबकि वास्तविकता यह है कि जिस समाज में मजदूरों का सम्मान नहीं होता, वहाँ मानवता की भावना की जड़ें कमजोर पड़ जाती है।
     महिला मजदूरों की स्थिति तो और भी अधिक दयनीय है। वे घर और कार्यस्थल दोनों जगह काम करती हैं। दिनभर ईंट ढोने या खेतों में काम करने के बाद भी उन्हें घर की पूरी जिम्मेदारियाँ निभानी पड़ती हैं। उनके काम को समाज में सामान्य ही माना जाता है, जबकि महिला परिवार और समाज दोनों की आधार होती हैं। मजदूर दिवस के अवसर पर महिला श्रमिकों के योगदान को विशेष रूप से स्मरण करना आवश्यक है।
   बाल मजदूरी भी समाज की एक गंभीर समस्या है। आज भी अनेक बच्चे गरीबी के कारण शिक्षा से वंचित होकर मजदूरी करने को मजबूर हैं। जिन हाथों में पुस्तकें होनी चाहिए, उनमें काम का बोझ दिखाई देता है। जब तक प्रत्येक बच्चे को शिक्षा उपलब्ध नहीं होगी, तब तक वास्तविक विकास नहीं कहा जा सकता।
आधुनिक युग में तकनीकी विकास इतना अधिक हुआ है, जिससे मजदूरों के सामने नई चुनौतियाँ भी आई हैं। अनेक स्थानों पर मशीनों ने मानव का स्थान ले लिया है, जिससे बेरोजगारी बढ़ी है। कई मजदूर दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते हैं, पर उनके परिवारों को पर्याप्त सहायता नहीं मिलती। जिससे उनके परिवार को समस्याओं का सामना करना पड़ता है। 
    मजदूर दिवस हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है, कि क्या केवल एक दिन श्रमिकों का सम्मान कर देना पर्याप्त है ? उनके जीवन की कठिनाइयों को वास्तव में समझना चाहिए। मजदूरों के प्रति सम्मान की भावना केवल भाषणों से प्रकट नहीं होती। उन्हें उचित वेतन दिया जाए व सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जाए।
  साहित्य और कला में भी मजदूरों के जीवन को विशेष स्थान दिया गया है। अनेक कवियों और लेखकों ने श्रमिकों के संघर्ष को अपनी रचनाओं में अभिव्यक्ति दी है। इन रचनाओं में मजदूर केवल एक पात्र नहीं, बल्कि संघर्ष और धैर्य का प्रतीक बनकर उभरे हैं। साहित्य समाज को यह समझाने का प्रयास करता है, कि मजदूरी केवल जीविका का साधन नहीं है बल्कि यह मानव अस्तित्व की गरिमा है।
 मजदूर कभी भी समाज से सम्मान या प्रशंसा की अपेक्षा नहीं करता है। उसका संघर्ष मौन होता है व अपनी पीड़ा का प्रदर्शन भी नहीं करता । अपने परिवार की आवश्यकताओं के लिए प्रयास करता रहता है। उसके हाथों के छाले त्याग और धैर्य का प्रतीक हैं।
  मजदूर दिवस केवल एक उत्सव ही नहीं, बल्कि मजदूरों के प्रति सम्मान की भावना प्रकट करने का अवसर है। इसलिए आवश्यक है कि हम केवल मजदूर दिवस मनाने तक सीमित न रहें, बल्कि अपने व्यवहार में भी सम्मान की भावना विकसित करें।
जिस दिन समाज मजदूर के हाथों के छालों में छिपी देश की ताकत को पहचान लेगा, उसी दिन मानवता का विकास संभव होगा।