कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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अपने ही खून से सींचा था,
माँ ने उस भ्रूण को जिया था
नौ महीने हाथों से पेट सहलाया था,
प्यार किया, दुलार दिया, पूरा ध्यान दिया था।
पर जब माँ ने नवजात किन्नर को जन्म दिया,
किसे पता था कि कोख से एक ‘किन्नर’ जन्मा
माँ की ममता वहीं बिखर गई,
असहाय होकर ममता भी मजबूर हो गई।
कहते हैं सब — माँ ईश्वर का रूप होती है,
नवजात को क्या पता था कि माँ इतनी मजबूर होगी
माँ का आँचल आँसुओं से भीगा होगा,
पर ‘इज़्ज़त’ के आगे हर बंधन टूटा होगा।
पल-पल अपने ही कलेजे के टुकड़े को देख,
नेत्र-नीर पीती रही, घुट-घुट जीती रही
समाज की झूठी इज़्ज़त ने मजबूर किया,
एक अँधेरी रात अपने ही लाल को दूर किया।
क्या माँ का सीना रातों को जगा होगा ?
किन्नर संतान की खातिर क्या उसने आँसू पोंछा होगा ?
“रहता जो मैं माँ के पास,
क्या हो जाता जग को इससे एतराज ?
माँ लड़ लेती सबसे, बच पाती क्या इज़्ज़त तब भी जग से ?”
इज़्ज़त बड़ी प्यारी थी,
किन्नर संतान रातों को भूखा-भटका होगा
माँ का आँसू क्या बहा होगा ?
मेरी भूख ने उसे तड़पाया होगा।
सड़कों पर भटका किन्नर, टूटा रातों में किन्नर,
बहुतों ने इस देह को नोचा, जगह-जगह ज़ख्मी किया
फिर भी मैंने, इस किन्नर जीवन में,
हर नवजात माँ को आशीष ही दिया।
हे ईश्वर! बदल दो ऐसी प्रथा,
ना तड़पे यहाँ कोई नवजात किन्नर अब
माँ का आँसू ना पोंछे आँचल अब।
ईश्वर ने तो मान दिया,
फिर क्यों दिया समाज ने अपमान दिया ?
किन्नर संतान भी है इंसान,
आज ‘ऋतु’ को क्यों ये एहसास हुआ —
माॅं तो है भगवान का रूप,
पर इज़्ज़त खातिर ममता भूली।
किन्नर संतान को न छोड़ें राहों में,
माँ की ममता अब आवाज़ उठाओ।
अपने सीने का दर्द तुम ना छुपाओ,
आँखों के आँसू आँचल में अब ना छुपाओ।
हर किन्नर को सम्मान मिले,
जीने का अधिकार मिले।
कोई किसी से भेद नहीं करे,
सबको पूरा मान मिले॥