नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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सबका संसार ‘माँ’ (‘मातृ दिवस’ विशेष)…
माँ एक छोटा-सा, प्यारा-सा अंश निराला,
जिसमें समाया अनुपम ब्रह्मांड निराला
माँ को अपनी ममता-प्रेम लुटाने में नहीं होती थकावट,
मैं माँ के लिए क्या लिखूँ, मैं हूँ माँ की लिखावट…।
माँ भोली है, अद्भुत छवि वाली है,
माँ की मूरत जैसे दूसरी कोई नहीं होने वाली है
सजल नयनों से निहारती, पूरी करती हर ज़रूरत,
मैं माँ के लिए क्या लिखूँ, मैं हूँ माँ की लिखावट…।
लोग कहते हैं आज माँ का दिन है,
वे भूलते हैं, कौन-सा दिन माँ के बिना है
दवा न असर करे तो नज़र उतारती है अनवरत,
मैं माँ के लिए क्या लिखूँ, मैं हूँ माँ की लिखावट…।
माँ को देखकर मुस्कुरा लेते हैं हम,
सभी तीर्थों का सुख पा जाते हैं हम।
भोली माँ की छवि देखने से पूरी होती हर ज़रूरत,
मैं माँ के लिए क्या लिखूँ, मैं हूँ माँ की लिखावट…।
माँ एक शक्ति है, जीवन जगाती है,
प्रथम पाठशाला बनकर सारे अक्षर-ज्ञान सिखाती है
माँ कितनी ज्ञानवान, दयावान- कहने की नहीं ज़रूरत,
मैं माँ के लिए क्या लिखूँ, मैं हूँ माँ की लिखावट…।
सोचूँ माँ का कर्ज उतार दूँ, उतार नहीं पाता,
माँ के बिना जीवन भवसागर पार नहीं जाता।
करूँ वंदना माँ के चरणों में, शीश नवाकर शत-शत,
मैं माँ के लिए क्या लिखूँ, मैं हूँ माँ की लिखावट…॥