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सूरज ने उगली आग

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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सूरज ने उगली आग,
धूप लहराई चारों ओर, अग्नि-सी बरसाई
ना दिन में चैन मिला, ना रातों में राहत,
हर समय लू के थपेड़े तन-मन को झुलसाते
मन को अशांत किए रहते।

झुलस रहे हैं हर पेड़ के पत्ते,
कोई ठंडी छाँव भी अब राहत न दे सके
हर जीव-जंतु और पक्षी गर्मी से परेशान है,
पानी ढूँढते फिरते, पर कहीं प्यास न बुझ सके।

गर्मी ने मानो अपनी सीमा ही पार कर दी,
दिन-ब-दिन उसकी तपिश बढ़ती ही जाए
धरती सूखकर जगह-जगह फट गई,
पक्षी पानी की खोज में धूप में भटकते जाएँ
कहाँ मिले वह जल, जिससे प्यास बुझ पाए।

तारकोल की सड़क पर चलना मानो अंगारों पर चलना है,
धरती गरम, गगन गरम — सबका बुरा हाल है
बिजली भी हरदम कटती रहती,
हर व्यक्ति का मन बेहाल है
मज़दूर, किसान और राह चलते लोग,
सबके चेहरे लाचारी से भरे नज़र आते हैं
ज़िंदगी की खुशियों को गर्मी ने जैसे बाँध लिया हो,
क्या करें, क्या न करें — इसी चिंता में मन व्याकुल रहता है।

कोई उपाय भी अब कारगर नहीं लगता,
विक्षिप्त-सा मन बेचैन होकर भटकता है
हर कोई अपनी ही पीड़ा में उलझा है,
दूसरों का दु:ख देखने का समय किसे है ?

कुएँ, तालाब और बावड़ियाँ सब सूख गए,
दूर-दूर से पानी लाने को लोग मजबूर हो गए
पीने के लिए एक बूँद पानी भी दुर्लभ हो गई,
एक-एक बूँद के लिए सब परेशान हो उठे
दिन काटना भी अब कठिन लगता है,
हाथ में पंखा लिए लोग इधर-उधर टहलते रहते हैं।

बिजली बिना ए.सी. और कूलर भी बंद पड़े रहते हैं,
ऐसे में मन कैसे बहले — यही एक ज्वलंत प्रश्न है।

ऐसी भीषण गर्मी पहले कभी न देखी थी,
जो आज चारों ओर फैल रही है।
यदि वृक्ष यूँ ही कटते रहे,
तो आने वाले दिन और भी भयावह होंगे।

जब सूरज यूँ ही आग उगलता रहेगा,
तो जीवन कैसे बचेगा, क्या उपाय रहेगा ?
कुछ समझ नहीं आता,
हर ओर लोग बेहाल नज़र आते हैं॥