कुल पृष्ठ दर्शन : 3

समय है, समझ जा

राधा गोयल
नई दिल्ली
******************************************

बेदर्दी से पेड़ काटने एक शिकारी आया,
पंछी का घोंसला बना था उसने उसे गिराया
नन्हें-नन्हें चूज़े उसमें डरे और सहमे से,
किसे पुकारें, मात-पिता दाने लाने निकले थे।

एक कबूतर देख रहा था दृश्य ये सारा,
उन बच्चों को आकर उसने दिया सहारा
बारिश की बूँदों से चूज़े काँप रहे थे,
तान घरौंदे पर पत्ते का छाता उन्हें बचाया।

मानव की धनलिप्सा ने पेड़ों को काटा,
शहर बसाने तालाबों को भी था पाटा
जीव-जंतुओं को भोजन के पड़ गए लाले,
बड़े अजब हैं जीवन के ये खेल निराले।

पेड़ कटे तो छाँव कहाँ से कोई पाएगा,
तप्त धूप में थका पथिक अब कहाँ जाएगा ?
हमको बेघर करके क्या खुश रह पाओगे ?
ऑक्सीजन के बिन क्या जीवित रह पाओगे ?

धरती का दोहन करके धन खूब कमाया,
कराह उठी धरती और तांडव खूब मचाया
प्रकृति की चेतावनी को अनदेखा करके,
धन संचय की जुगत में अपना समय बिताया।

भूल गया कि पेड़ सभी को फल देते हैं,
भूल गया कि गर्मी में छाया देते हैं
भूल गया कि पेड़ कार्बन को भी सोखते,
भूल गया कि पेड़ बाढ़ को भी हैं रोकते।

भूल गया कि वनचर जीव कहाँ जायेंगे ?
अपनी क्षुधा शांत करने को हिंसक जंतु।
शहरों में आकर मानव को खा जायेंगे,
अभी समय है समझ जा, ऐसे मत कर दोहन॥