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गंगा अवतरण कथा

प्रीति तिवारी कश्मीरा ‘वंदना शिवदासी’
सहारनपुर (उप्र)
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गंगा दशहरा पर्व (२६ मई) विशेष…

क्यों होता है गंगा दशहरा तुमको आज बताती हूँ,
बड़ी पुरानी कथा प्रेम से तुमको आज सुनाती हूँ।

राजा सगर ने एक बार था अश्वमेध का यज्ञ किया,
चुरा अश्व को इंद्र ने कपिल मुनि के आश्रम बांध दिया।

सगर ने अपने साठ हजार पुत्रों को आदेश दिया,
जाकर यज्ञ का अश्व छुड़ाओ, आखिर किसने बांध लिया ?

कपिल मुनि को ‘चोर-चोर’ कह कर चिल्लाए सारे थे,
तेज के तप से कपिल मुनि के भस्म हो गए सारे थे।

अंशुमान ने आकर जब सगर को यह संदेश दिया,
ये लो पकड़ो अश्व यज्ञ का मुनि ने उनको भस्म किया।

सगर दुःखी थे बोले,-अंशु कैसे पुत्रों की मुक्ति होगी। 
कौन करेगा ब्रह्मा का तप, गंगा कैसे अवतरित होगी ?

राजा सगर ने करी तपस्या, लेकिन सफल न हो पाए,
अंशुमान ने करी तपस्या, लेकिन सफल न हो पाए।

फिर तप करने अंशुमान के पुत्र दिलीप जी आए,
पुत्र दिलीप ने करी तपस्या, वो भी सफल न हो पाए।

दिलीप के थे पुत्र भागीरथ, वो थे पिता के अनुगामी,
कठिन ‌तपस्या की ब्रह्मा की, प्रभु प्रसन्न अंतर्यामी।

कहने लगे ‌कमंडल से,- मैं मुक्त जो गंगा करता हूँ,
कौन संभाले वेग गंगे का, इसीलिए मैं डरता हूँ।

पृथ्वी पर गंगा का शिव से वेग संभाला जाएगा,
पर शिव का तुम करो अराधन तब संभव हो पाएगा।

फिर भागीरथ शिव तप करके शिव को प्रसन्न कर पाए,
जग में शिव ने वेग संभाला, गंगा को वश कर पाए।

जटाजूट से गंगधार को ज्यों ही शिव ने मुक्त किया,
भागीरथ के पीछे गंगा धरती ने पथ आप दिया।

जह्नू ऋषि का आश्रम नष्ट-भ्रष्ट गंगा ने कर डाला,
विध्न समझ अपने तप में ऋषि ने गंगाजल पी डाला।

भागीरथ ने ऋषि चरणों में गिरकर उनसे विनय किया,
अपनी जांघ से जह्नू ऋषि ने गंगा माँ को मुक्त किया।

तब कहलाई जम-पुत्री गंगा का ‘जाह्नवी’ नाम हुआ,
कपिल मुनि के आश्रम पहुंची, भागीरथ तप सफल हुआ।

साठ हजार जो पुत्र सगर के, गंगा माँ ने तार दिए,
ब्रह्मा जी फिर प्रकट हुए, भागीरथ को वरदान दिए।

सभी अमर हो जाएंगे, ये तेरा नाम जग में होगा,
तेरे नाम से भागीरथी गंगा का नाम प्रचलित होगा।

धरती पर अवतरित हुईं, दिन गंगा दशहरा कहलाया,
ज्येष्ठ मास दशमी तिथि को गंगा का  अवतरण हो पाया।

इस दिन स्नान, दान-तर्पण पापों का नाश कर जाता है,
गंगे माँ की महिमा ऐसी, पापी नर तर जाता है॥