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वृक्षों, पेड़-पौधों और नदियों का अपना महत्व

हरिहर सिंह चौहान
इन्दौर (मध्यप्रदेश )
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गंगा दशहरा पर्व (२६ मई) विशेष…


     दस पापों को नष्ट करने वाले शुभ योग के संयोग के साथ ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि पर पूरे देश में ‘गंगा दशहरा’ पर्व मनाया जाता है। इस दिन माँ गंगा के स्वर्ग से धरती पर अवतरण की खुशी में इस पर्व का अपना अलग महत्व है। हमारे यहाँ नदियों को भी माँ कहते हैं, इसलिए गंगा दशमी के दिन गंगा माँ के घाट पर स्नान करने से दस प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है। सनातन संस्कृति की मजबूती इन्हीं सभी पर्व व त्यौहारों की आस्था के कारण बनी हुई है। हिंदू धर्म में इस दिन सूर्य उदय के पूर्व गंगा नदी में स्नान पुण्य कर्मों के उदय और मनोकामनाएं पूर्ण करने हेतु बहुत श्रेष्ठ है। 
गंगा दशहरा पर्व पर कोई भी नदी हो, उसमें माँ गंगा का नाम लेकर हम डुबकी लगाएं, और प्रकृति पर्यावरण एवं जल संरक्षण हेतु भी संकल्पित होना हम सभी का फर्ज है, क्योंकि आत्मचिंतन के साथ आध्यात्मिकता से मन में शुद्ध भाव व सच्चे विचार आते हैं। वर्तमान समय में आदमी भाग-दौड़ भरी जीवन-शैली के कारण मानसिक शांति को तलाशता है। इसलिए ऐसे त्योहार व पर्व पर आत्मचिंतन के कारण मन प्रफुल्लित होता है। इस दिन दान-पुण्य के साथ परोपकार भाव बहुत जरूरी है। हम कितने भी आधुनिक हो जाएं, धर्म-कर्म ध्यान व आत्मिकता के साथ साथ वैचारिक चिंतन व संवाद बहुत जरूरी है, क्योंकि हम भारतीय हैं, और हमारे यहां सभी धर्म-संस्कृति का मान-सम्मान करना हमारे संस्कारों में है। नदियों व झरनों को देख कर मन में विचार आता है, 
यह कौन चित्रकार है ?, जिसने नदियाँ, पर्वत और धरती बनाई है। अपनी वसुंधरा में प्रकृति की हरियाली और अविरल प्रवाह से बहती हुई नदियाँ हमारे आंनद को उल्लास के रंग में प्रफुल्लित करके एकजुट करती हैं। हम इससे दूर ना जाएं तो ही इस रंग-बिरंगी हरियाली व पहाड़-नदियों के स्नेह व वात्सल्य की सार्थकता को जीवन में उतार सकते हैं। हमें दैनिक जीवन-शैली में अब प्रकृति फल, फूल रंग-बिरंगे पेड़-पौधे, नदी और इस मिट्टी से जुड़ना ही होगा, क्योंकि समय हर एक चीज का महत्व समझा देता है। यह बहुत जरूरी है, क्योंकि हम बहुत ज्यादा आधुनिकता की ओर बढ़ गए। ईंट-पत्थरों के बड़े-बड़े ताजमहल बना लिए, पर फिर भी हमें वृक्षों, पेड़-पौधों और नदियों का अपना महत्व अब याद आ रहा है। नीम-पीपल के वृक्षों का महत्व अब समझ आ रहा है, पर्यावरण व प्रकृति और नदियों को दूषित करके हमने सब बिगाड़ दिया है। हमें प्रकृति के दोहन का खामियाजा भुगतना ही पड़ेगा ? प्रकृति ने हमें जंगल, खेत-खलिहान हरा-भरा रंग-बिरंगा संसार दिया, पर हमारे ज्यादा की जरूरत ने लालच का मुँह खोल कर ईंट-पत्थरों के आशियाने बना लिए। पर, चलो देर से आए,
दुरुस्त आए। अब हमें मालूम हो चुका है, कि यह हमारे मित्र हैं। हमें स्नेह-प्यार के साथ स्वस्थ जीवन व सकारात्मक ऊर्जा की संजीवनी बूटी यानी ‘आक्सीजन’ भी देते हैं। नदियाँ हमें पानी देती है और धर्म, संस्कृति व सनातन संस्कारों को जीवित रखती है। गंगा दशहरा पर्व हम सभी इसलिए ही मनाते हैं, कि भारतीय संस्कृति व संस्कारों का स्तर उच्च रहना चाहिए और पाप से मुक्त होकर धर्मध्वजा लहराती रहे।
     लोक माता अहिल्याबाई होलकर ने महेश्वर के प्राचीन घाट (अहिल्या घाट) पर माँ गंगा मंदिर की स्थापना की थी। लोकमान्यता है कि गंगा लहरी की कथा के दौरान गंगा माता माँ नर्मदा से मिलने आती है, तब नर्मदा मैया के जलस्तर में अपने-आप वृद्धि हो जाती है। यहाँ गंगा अवतरण का पर्व सांस्कृतिक चेतना और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक मानते हैं। वर्तमान समय में पर्यावरण, प्रकृति और नदियों का संरक्षण बहुत जरूरी है, हमें इस जीवंत धरोहर को आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाना ही होगा, क्योंकि अध्यात्मिक ज्ञान व मन शुद्धि के लिए ऐसे पौराणिक पर्वों का अपना महत्व है।