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मानव बनाम दानव

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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मानव से दानव बनते है लोग,
इन्सान नहीं हैवान हैं वे लोग।

अपने स्वार्थ मे इतना गिर जाते वे,
अपनी संवेदनाएं भूल जाते है ये।

प्रेम, दया, करूणा खो कर क्रूरता की ओर बढ़ते,
रावण ने भी यही किया था, जो आज कर रहे हैं ये लोग। 

एक छोटा बच्चा जो बचपन में राम बना,
फिर वही बड़ा हो कर रावण बना।

कैसे हुआ ये महापरिवर्तन,
राम से रावण बना दिया उसे।

अभाव, चिंता, अशान्ति, असुविधाएं जीवन की,
मानव से दानव बना दिया उसे।

मनुष्य मानवता जब भूले विवेक अपना खो दे,
इन्सान राक्षस बन जाते, रहे ना अपने बस में।

क्रूरता, स्वार्थ और हिंसा के रस्ते चल पड़ते, 
तब मानव से दानव बनते क्या देर लगे।

बदले की भावना विशेष होती इनमें,
आज देखते हैं दहेज प्रथा के बोल-बाले।

नहीं मिले दहेज तो लड़की की जान खतरे में,
यह क्रूरता की पराकाष्ठा है फिर भी करते।

करने के पहले सोचते नहीं, गलत या सही किया,
इन्सान का बनना ऐसी स्थिति है।

जब मानव अपना विवेक खो देते,
मानवता भूल कर घृणा को अपनाते।

तब मानव से दानव बनना तय हो जाते,
यही आगे चल कर मानव से दानव बन जाते॥