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धन, शक्ति, यौवन पर गर्व न  करो

प्रीति तिवारी कश्मीरा ‘वंदना शिवदासी’
सहारनपुर (उप्र)
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धन, शक्ति, यौवन पर गर्व अत्यंत न करो। 
बिन प्रभु सुमिरे जीवन को अंत न करो॥

यह विश्व प्रभु माया की शक्ति, 
तुम भक्ति की शक्ति पहचानो। 
रैन-दिवस ऋतु काल की क्रीडा, 
हर पल जीवन नष्ट हुआ जानो॥
सुमिरन छोड़ के इच्छाएं अनंत न करो,
बिन प्रभु सुमिरे जीवन को अंत न करो…॥

भांति-भांति के रूप वेश जन,
सब पेट की खाति धरते हैं। 
बढ़ी जटाएं भगवा वसन तन,
मस्तक चंदन तिलक संवरते हैं॥
पेट की खातिर झूठे सब प्रपंच,
बिन प्रभु सुमिरे जीवन को अंत न करो…॥

तीनों लोकों में संत समागम, 
भव सागर पार की नौका है। 
भक्ति, मोक्ष का पथ दिखलाएं,
सब को तरने का मौका है॥
लख चौरासी भटकन क्यों अंत न करो,
बिन प्रभु सुमिरे जीवन को अंत न करो…॥

अहंकार करने की खातिर, 
कुछ भी नहीं है तेरे पास‌‌।
तन, धन, यौवन अपना‌ माने, 
कभी ना रखियो इनकी आस॥
सच्ची आस प्रभु से क्यों तुरंत न करो।
बिन प्रभु सुमिरे जीवन को अंत न करो…॥

बिना विवेक ज्ञान, धन, शक्ति, 
यौवन होता सब बेकार। 
प्रभु कृपा से आज तलक,
हर कोई उतरा भव‌ से पार॥
माया का लालच जीवन पर्यंत न करो,
बिन प्रभु सुमिरे जीवन को अंत न करो…॥

हर विधा गुण,सारहीन यदि,
प्रभु-भक्ति से दूर करे।
जंतु केवल पेट भरे भव,
मुक्ति का न जतन करे॥
क्यों प्रभु नाम से हर मौसम बसंत न करो,
बिन प्रभु सुमिरे जीवन को अंत न करो…॥

धन, शक्ति, यौवन पर गर्व अत्यंत न करो। 
बिन प्रभु सुमिरे जीवन को अंत न करो॥