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खुशियाँ भी आने से डरती

हरिहर सिंह चौहान
इन्दौर (मध्यप्रदेश )
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कहीं दूर चला गया,
वह जो साथी था मेरा
अब सब ‘सूना’ हो गया,
इसीलिए ‘खुशियाँ’ भी आने से डरती है यहाँ…।

एक ‘सैलाब’ आया था ज़माने में,
सब कुछ बहा कर ले गया
अपने थे, वह अब नहीं दिखाई देते हैं,
इसीलिए ‘खुशियाँ’ भी आने से डरती है यहाँ…।

ख़्वाब बहुत सजाए थे हमने,
पर क्या करें, वह अधूरे ही रह गए
उन्हीं अधूरी ‘तमन्ना’ को लिए कहता हूँ मैं,
‘खुशियाँ’ भी आने से डरती है यहाँ…।

पुराने ‘लोग’ कहते हैं, इतना ऊँचा मत उड़ो,
कि आसमान से ‘जमीं’ पर आने में डर लगे।
मंज़िल हर किसी को नहीं मिलती है ‘जमाने’ में,
तभी तो ‘खुशियाँ’ भी आने से डरती है यहाँ…॥