बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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सुबह अभी पूरी तरह जागी भी नहीं होती,
आकाश पर हल्की रोशनी फैल रही होती है
तभी एक किसान अपने घर से निकल पड़ता है।
उसके कदमों में जल्दी नहीं होती,
लेकिन उसके मन में
दिन भर के कामों की लंबी सूची होती है।
वह खेत को केवल मिट्टी का टुकड़ा नहीं मानता,
वह उसे अपने जीवन का हिस्सा समझता है।
जहाँ दूसरे लोग जमीन देखते हैं,
वह वहाँ आने वाले दिनों की उम्मीद देखता है
वह जानता है कि छोटे-छोटे बीज
एक दिन बड़े पौधों में बदल सकते हैं,
और पौधे किसी के घर की रसोई तक पहुँच सकते हैं।
धूप उसके साथ चलती है,
हवा उसके चेहरे को छूती है
और मौसम कभी उसका साथ देता है,
तो कभी उसकी परीक्षा लेने लगता है
लेकिन वह हर दिन फिर भी खेत में आता है,
वह शिकायतों की जगह मेहनत को चुनता है।
उसके हाथों पर पड़ी रेखाएँ
सिर्फ उम्र की पहचान नहीं होतीं,
वे कई वर्षों के संघर्ष की कहानी भी होती हैं।
उन हाथों ने मिट्टी को कई बार पलटा है,
बीजों को संभालकर बोया है
सूखी धरती को उम्मीद से देखा है,
और बरसात की पहली बूँदों का इंतज़ार किया है।
जब बारिश देर से आती है,
तो उसकी आँखों में चिंता दिखाई देती है
जब फसल अच्छी होती है,
तो उसके चेहरे पर
हल्की मुस्कान दिखाई देती है।
उसकी खुशी बहुत बड़ी नहीं होती,
लेकिन बहुत सच्ची होती है
हम रोज़ अपने घरों में भोजन देखते हैं,
लेकिन उसके पीछे की मेहनत
अक्सर दिखाई नहीं देती।
एक किसान अपने लिए ही काम नहीं करता,
वह उन अनगिनत लोगों के लिए काम करता है
जिनसे वह कभी मिला भी नहीं होता।
उसकी ज़िंदगी आसान नहीं होती,
फिर भी वह हर सुबह
नए विश्वास के साथ उठता है
वह जानता है कि जीवन रुकने का नाम नहीं है।
शायद इसलिए किसान
केवल एक व्यक्ति नहीं होता,
वह धैर्य, परिश्रम और
उम्मीद की एक जीवित तस्वीर होता॥