ममता सिंह
धनबाद (झारखंड)
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माँ हमारी भारती, वो स्वतंत्रता पुकारती,
हमें नि:शब्द देखती, बाट हमारी जोहती।
हमारे लाल हमें न भूले, माँ याद करा देती,
अपना कर्तव्य भले भूलें, माँ नहीं भुला पाती।
जाने कौन घड़ी में, वेश बना खलनायक आए,
हमारे घरों का सुख-चैन, सेंध मार चुरा ले जाए।
हमें जब तक समझ आती, माल हमारा जा चुका था,
औेर भी चुराने की खातिर, तैयारी पूरी हो चुकी थी।
किया विद्रोह ब्रिटिशों का, लाला लाजपत ने पहचाना,
उन्हें दबाने की चाहत में, कड़ा दंड सुना दिया।
इस चक्कर में जान चली गई, हिंसा और भड़क उठी,
लोगों ने विद्रोह कर दिया, अंग्रेजों की नींव हिल गयी।
अंग्रेजों ने ‘फूट डालो, शासन करो’ की नीति अपनाई,
उनकी टेढ़ी चाल लोगों को, जल्दी समझ में आ गई।
सभी बुद्धिजीवी आगे आए, नयी- नयी योजना बनाई,
शस्त्रों की जरूरत को समझ, उनके यहाँ डाका डाला।
महात्मा गांधी ने अहिंसा, भूख हड़ताल धरना किया,
गांधी की धाक बड़ी थी, लोगों ने योजना सफल किया।
थक-हार कर अंग्रेजों ने, अपने हथियार डाल दिए,
पन्द्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालिस को भारत आजाद किया।
आज भारत तो आजाद है, फिर भी हम आज गुलाम हैं,
हम सब आज अपने-अपने, घरों में रूढ़िवादी विचारों से कैद हैं।
हमें आजादी का चाहिए सपना, देखते हैं परिवार से अलग होना,
उन्हें लगता है कि अलग रहकर, ही शायद सुकून मिलेगा।
पश्चिमी सभ्यता की नकल, करके हम आजाद रहेंगे,
बिखरे और छोटे परिवार से सूकून मिलेगा ?
कोई उन्हें जाकर बताए, एकसाथ रहने से खुशी बढ़ती है,
अकेले होने से उन्हें कोई भी, आसानी तोड़ सकता है।
छोटे-बड़ों का संस्कार-सम्मान, अपने परिवार में ही मिलता है।
सुख-दु:ख मिलकर सहना और बांटना अपनों में हो सकता है॥