डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)
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तुम्हारे होने से मन में, मधुमास प्रेम का रहता है,
सूने जीवन के आँगन में, विश्वास खिला मुस्काता है
विरह मिले तो याद तुम्हारी जलती है दीपक बनकर,
मिलन घड़ी में अधरों पर, मुस्कान सुगंधित खिलती है।
समर्पण से रिश्तों की डोरी और प्रगाढ़ हो जाती है,
अनकही बातें मौन हियतल की, तुमसे ही कह पाती है
सहज-सुगम हो जाती जब तुम साथ रहो तो हर मुश्किल,
तुम्हारे होने से जीवन में, सरगम धुन बज जाती है।
तुम्हारे होने से जीवन में, मधुर उजाला रहता है,
सूने मन के वियोग में भी, कोई दीपक जलता है
विरह समय में तो धैर्य तुम्हारा, साँसों को सहला देकर,
मिलन घड़ी में स्नेह तुम्हारा, हर पीड़ा को हर लेता है।
विश्वासों की डोर थामकर, दिल रिश्ते और सँवरते हैं,
समर्पण के निर्मल जल से, संगम के कमल निखरते हैं
तुम साथ रहो तो राह कठिन भी, जैसे लगती है उत्सव,
तुम्हारे होने से ही दुनिया, अपनी-सी प्रिय! लगती है।
दूर रहो तो याद तुम्हारी, बन दीपक साथ चलता है,
रिश्तों की इस भीड़ में अपना, कोई स्वयं मिल जाता है।
तुम हो तो हर दर्द सफ़र में, बन जाता है सुर गीत नवल,
तुम्हारे होने से जीवन, संजीवन-सा हो जाता है॥
परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥