रखे जाल बुन-बुन
विजयलक्ष्मी विभा इलाहाबाद(उत्तरप्रदेश)************************************ अब तो नव जन्मे जीवन में, लग जाता है घुन।फिर भी हमें लगी रहती है, वृद्धापन की धुन॥घटते जीवन का भी अपने,बढ़ता पल-पल भावथोड़ी उम्र और मिल जाये,सभी लगाते दाव।अब तो बांट रहा है सृष्टा, प्राण हमें चुन-चुन…॥ स्वाति-स्वाति रटते बुझ जाती,चातक की भी प्यासनयनहीन ही नयनों को अब,देते यहां प्रकाश।तुला तुल्य हो … Read more