काश! मैं किसी कंपनी का निदेशक (वित्त) होता!

डॉ.शैलेश शुक्लाबेल्लारी (कर्नाटक)**************************************** काश! मैं बड़े निगम का निर्देशक (वित्त) होता-जो कि सिर्फ एक पद नहीं, बल्कि एक शक्ति-पोषक स्थिति है। मैं बस बैलेंस शीट ही नहीं, बल्कि उसके साथ ही बैलेंस ऑफ पॉवर भी संभालता। जहाँ कर्मचारी पोर्टल मुद्दों पर नतीजे रहते, वहीं मेरी दुनिया में वित्तीय फ्लो से ज्यादा जरूरी होता कैश फ्लो। … Read more

पांडेय जी और दिल की दिल्लगी

लालित्य ललितदिल्ली*********************************** हुआ क्या चुनांचे! दिल है मांगे कुछ, सोचे कुछ। पांडेय जी ने कई दिनों से अपनी गाड़ी सड़क पर नहीं निकाली, जब से मेट्रो से दिल लगा बैठे। फिर क्या हुआ, वह बता दें आपको।सड़क पर पांडेय जी थे और उनकी गाड़ी। आज उनका मन गाड़ी में नहीं लगा, क्योंकि डैश बोर्ड पर … Read more

अर्थव्यवस्था की रीढ़-सिविल इंजीनियर देवो भव!

डॉ.शैलेश शुक्लाबेल्लारी (कर्नाटक)**************************************** हम भारतीयों को अपने आराध्य देवों की पूजा करना सदा से प्रिय रहा है। कोई भोलेनाथ की आराधना करता है, कोई गजानन को प्रसन्न करता है, कोई मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम का स्मरण करता है, कोई बजरंगबली, संकतमोचक हनुमान को, कोई नोटबंदी के दौर में एटीएम को, तो कोई हरियाली में छुपे … Read more

बॉस इस आलवेज राइट!

डॉ.शैलेश शुक्लाबेल्लारी (कर्नाटक)**************************************** आजकल ऑफिस में काम करने के लिए केवल डिग्री, कम्प्यूटर और फॉर्मल कपड़े काफी नहीं हैं। जो सबसे ज़रूरी चीज है, वह है-बॉस की चापलूसी। और यह साधारण चापलूसी नहीं, यह है बॉस-स्तुति, प्रशंसा-पुराण, और गुणगान-महाकाव्य। यह वह ब्रह्मास्त्र है, जो सालाना मूल्यांकन रेटिंग, अधिक से अधिक बोनस, जब चाहो तब छुट्टी, … Read more

विकसित भारत और हम…

कवि संगम त्रिपाठीजबलपुर (मध्यप्रदेश)********************************************* विकास के कुछ पायदानों को अब जोड़ा जाना है… अर्थात हमारे देश की विकास की दिशा में निरंतर वृद्धि हो रही है, इसमें कोई संदेह नहीं है। अभी हालिया वक्तव्य में कहा गया है, कि हम विकसित भारत का लक्ष्य २०५० तक पूरा कर लेंगे, अगर इसी तरह काम चलता रहा … Read more

गालियों का बाज़ार

डॉ. मुकेश ‘असीमित’गंगापुर सिटी (राजस्थान)******************************************** शहर के बीचों-बीच एक नया ‘बाज़ार’ खुला है-नाम है ‘गालियों का बाज़ार।’ यहाँ सब कुछ बिकता है-आत्मा का सौंदर्य छोड़कर। कहने को तो यह भाषाई स्वतंत्रता का सशक्त मंच है, लेकिन असल में यह सुनियोजित मौखिक युद्ध क्षेत्र है, जहाँ शब्द तलवार बनते हैं और जुबानें बंदूक की ट्रिगर। यहाँ … Read more

मुफ्त के ज्ञान की बाढ़

हरिहर सिंह चौहानइन्दौर (मध्यप्रदेश )************************************ मुफ्त के ज्ञान और इन ज्ञानियों ने हर एक तरफ़ माहौल-सा बना कर रखा हुआ है, क्योंकि मुफ़्त के चंदन का अपना अलग मजा होता है। कहीं भी चले जाएँ, हमें अतिरिक्त होशियार-समझदार सज्जन मिल ही जाते हैं। हमारे शहर में भैय्या पोहे के साथ ऊपर से अलग से प्याज़ … Read more

पांडेय जी और शादी वाली रात के किस्से

लालित्य ललितदिल्ली*********************************** “भाई साहब नमस्ते” अगले को कहा ही था…कहने लगे “पेले तो हमारे साथ बैठिए, यह क्या बात हुई कि आप महिलाओं के हिस्से में जा पड़े!”मन की बात थी, जिसे दिल से कही आखिर यह कोई दिलजला ही कह सकने की हिम्मत रख सकता है।पांडेय जी ने कहा-“अजी आपको दिल से सुना है, … Read more

ऐसो लागो रंग, छुड़ाए ना छूटे…

डॉ. मुकेश ‘असीमित’गंगापुर सिटी (राजस्थान)******************************************** रंग बरसे… (होली विशेष)… “रुको अभी… तुम्हारा नंबर ३ है… लाइन से आओ।”श्रीमती जी ने टोकन नंबर दे दिया है।मैं बाथरूम के बाहर खड़ा हूँ। शिखा से लेकर नख तक रंगों और गुलाल से मालामाल…। इससे पहले कि कोई मरीज आ धमके और मुझे रंगे हाथों पकड़ ले, इन रंगों … Read more

लोकसेवकों के यहाँ भण्डार भरा!

हरिहर सिंह चौहानइन्दौर (मध्यप्रदेश )************************************ छोटे-मोटे, दुबले-पतले कैसे भी कर्मचारी हों, कोई से भी विभाग में उनका कुनबा हो, भ्रष्ट तंत्र की दीमक उस पर अपना काम दिखा ही देती है। उसको धन-सम्पदा की कोई कमी नहीं रहती है। उनका खजाना मानों स्वयं कुबेर देवता ही बड़े-बड़े घड़ों में भर रहे होते हैं। आजकल जहां … Read more