रगों में भ्रष्टाचार
नीलम प्रभा सिन्हाधनबाद (झारखंड)********************************************* लहू के बदले,अब बहतामानव की,रगों में भ्रष्टाचार। हर एक सच्चा नर,हरदम सोचेंक्यूँ हुए सब,इतने भ्रष्ट। लहू के बदले,चाहना ले डूबाहर इंसान को,अच्छा-बुरे का भेद मिटाया। दिल ने मजबूर किया,इच्छा ने हैवान बनायाहर इन्सान को पर,मानव समझ न पाया। अपनी नियति,कब क्यूँ और कैसे ?दिल से मजबूर हुए,समझ न पाया मन। मन … Read more