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एक पीड़ा..

कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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भारतीय सेना… (‘आपरेशन सिंदूर’ दिवस विशेष)….

स्वर्ग की वादियों में
हिंदू की कहानी लिखी गई,
खुशियों की बारातों में
आँखों से खून की नदी बही।

पहलगाम में जब
सिंदूर उजड़ गया,
चेतावनी नहीं थी वो
सनातन पर हमला था।

“सनातनी हैं हम” —
सुनते ही आतंकी टूट पड़े
आँखों के सामने खुशी
मातम में बदल गई,
रोम-रोम पर अत्याचार हुआ
ये कैसा कहर बरपा ?

नई ब्याहता की माँग उजाड़ी,
हाथों की मेंहदी बेरंग हुई
कल जो दुल्हन सजी थी,
आज विधवा के वेश में खड़ी हुई।

हाहा-कार मच गया पहलगाम में
जब भेष बदलकर शैतान आए,
‘हिंदू’ शब्द सुनते ही
धड़ाधड़ गोलियाँ चलाई।

जोड़े सब गए थे
स्वर्ग की वादियों में,
खुशी मनाने —
लौटे ताबूत में।

क्या कसूर था उन हँसती आँखों का ?
बुझ गए घर के दीपक सारे,
माँग के सिंदूर चले गए
बच्चों का आदर्श मिट गया,
आँखों के सामने
पापा का अंत हुआ।

हिंदू होने का फर्ज अदा किया,
देश को अपना सुहाग दिया
२७ हिंदुओं को चुन-चुनकर मारा,
सोचना — पानी कहाँ से लाओगे ?
खून और पानी एकसाथ नहीं चलेंगे!

नपुंसकता का काम किया,
औरत समझकर तूने छोड़ दिया
बहुत बड़ा अपराध किया,
सिंदूर का अपमान किया।

हम भारत की नारी हैं
देश पर मर-मिटना जानते हैं,
पति के साथ जल जाना
हमारे इतिहास की कहानी है,
हम मिटेंगे देश के लिए
पर तूने बहुत गलत किया,
तूने बहुत गलत किया।

मरते-मरते गर्व से कह गए
हमारे देश के भारतवासी —
“हम हिंदुस्तान के हिंदू हैं,
यही हमारी गर्व की कहानी है।”

जय हिंद, जय भारत।
जय जय सनातनी,
जय श्री राम।
निशब्द… ॐ शांति…
पहलगाम के शहीदों को श्रद्धांजलि॥