मह-मह महकी वसुन्धरा
राधा गोयलनई दिल्ली****************************************** प्यासी धरती पर जल बरसा, मह मह महकी वसुंधरा,चहुँ ओर यौवन छाया, हर घाट-घाट है हरा-भरापात-पात पर कलियाँ के मुख खुलने को अब विकल हुए,कलियों का चुम्बन करने को भ्रमरों के दल निकल पड़ेधानी चादर ओढ़ धरा ने अपना आँचल लहराया,मह-मह महकी वसुंधरा को देख मन बहुत हर्षाया। आल्हादित हो गया गगन, … Read more