गंदगी बनाम अश्लीलता को रोकना ही होगा

अजय जैन ‘विकल्प’इंदौर (मध्यप्रदेश)***************************************** समाज में कोई भी माध्यम हो, किसी भी स्तर पर गलत प्रचार सामग्री बनाम अश्लीलता को अस्वीकार किया जाना बहुत आवश्यक है, फिर चाहे वो ओटीटी पर परोसी जा रही गंदगी ही क्यों नहीं हो। अभिव्यक्ति की सीमा के नाम पर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करना बहुत जरूरी है, वरना … Read more

त्याग, तप और तेज का पर्याय ‘वीर सावरकर’

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’बेंगलुरु (कर्नाटक) ************************************************* विनायक दामोदर सावरकर, जिन्हें आदरपूर्वक ‘वीर सावरकर’ कहा जाता है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन अग्रदूतों में थे; जिनकी लेखनी और कर्म दोनों में अदम्य राष्ट्रप्रेम धधकता था। उनका जन्म २८ मई १८८३ को महाराष्ट्र के भगूर ग्राम में हुआ। बाल्यावस्था से ही उनमें स्वाधीनता की ज्वाला प्रज्वलित थी। … Read more

रुद्राक्ष हो या इंसान… ‘एकमुखी’ बहुत कम मिलते

डॉ. प्रताप मोहन ‘भारतीय’सोलन (हिमाचल प्रदेश)***************************************************** सतरंगी दुनिया… ‘ईमानदारी’ का महत्व इसी बात से समझ में आता है, कि जो व्यक्ति स्वयं गलत काम करता है, परंतु अपने नौकर से ईमानदारी की अपेक्षा करता है। वफादार सभी कोई चाहते हैं, परन्तु स्वयं कोई बनता नहीं चाहता। “हमारे देश में सरकारी अस्पताल का मतलब है-जान से … Read more

शिक्षा में न्यायपालिकाःसंवाद की जरूरत है, विवाद की नहीं

ललित गर्ग दिल्ली*********************************** एक बार फिर शिक्षा से जुड़ा एक प्रश्न राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है। शिक्षा मंत्रालय और राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा प्रकाशित आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में ‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ शीर्षक, वाले अध्याय में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और लंबित मुकदमों का उल्लेख … Read more

वैवाहिक समारोह में बढ़ता दिखावा नुकसानदायी

पद्मा अग्रवालबैंगलोर (कर्नाटक)************************************ भारतीय संस्कृति में विवाह एक पवित्र, अटूट और आध्यात्मिक संस्कार है, जो २ आत्माओं और परिवारों को सात जन्मों के लिए जोड़ता है। विवाह में अग्नि को साक्षी मान कर सप्तपदी और सात वचन ही विवाह की स्थिरता का मुख्य स्तंभ होता है, जो वर-वधू को जीवनभर साथ निभाने का वादा कराते … Read more

‘मुफ्त रेवड़ी’ पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी बड़ी चेतावनी

ललित गर्ग दिल्ली*********************************** भारतीय लोकतंत्र की विडम्बना यह है कि चुनाव आते ही जनसेवा का स्वरूप बदलकर जनलुभावन राजनीति में परिवर्तित हो जाता है। राजनीतिक दलों ने मुफ्त की योजनाओं को चुनावी सफलता का छोटा रास्ता बना लिया है। मतदाताओं को तात्कालिक आर्थिक लाभ देकर मत हासिल करने की प्रवृत्ति लगातार मजबूत हो रही है। … Read more

जीवन में सामंजस्य की महत्ता समझिए

राधा गोयलनई दिल्ली****************************************** हम सामाजिक प्राणी हैं और समाज का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। यदि जीवन में सफल होना और खुशी से भरपूर जीवन जीना चाहते हैं, तो हमें एक-दूसरे से सामंजस्य बनाकर चलना बहुत जरूरी है। फिर चाहे वह हमारा कार्यस्थल हो अथवा घर परिवार, अन्य सम्बन्धी या आस-पड़ोस। संयुक्त परिवार हो … Read more

अहसास के पन्ने

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’बेंगलुरु (कर्नाटक) ************************************************* रवि को लिखने की आदत बचपन से थी। उसकी जेब में हमेशा एक छोटी-सी डायरी रहती, जिसके पन्नों पर वह अपने अहसासों को दर्ज करता। शहर की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में उसे अक्सर लगता-लोग बोलते बहुत हैं, सुनते कम; दिखते बहुत हैं, महसूस कम करते हैं।कॉलेज के आख़िरी साल … Read more

भारत की नई डिजिटल नीति की असली परीक्षा

डॉ. शैलेश शुक्लाबेल्लारी (कर्नाटक)**************************************** डिजिटल मीडिया का युग मूलतः ‘गति’ का युग है-खबरें सेकंडों में फैलती हैं, प्रतिक्रियाएँ मिनटों में बनती हैं, और जनमत कई बार घंटे भर में दिशा बदल लेता है। इसी तेज़ रफ्तार के बीच अब एक नई शक्ति निर्णायक बनकर उभरी है-कृत्रिम मेधा के सहारे बनी सामग्री, खासकर ‘डीपफेक’ और सिंथेटिक … Read more

एक अधूरा आदमी

डॉ. योगेन्द्र नाथ शुक्लइन्दौर (मध्यप्रदेश)***************************************** आज सुबह से ही उसे लक्ष्मी याद आ गई। उस समय एक चोका था, सबसे पहले वह खाने का भोग ठाकुर जी को लगाती थी… उसकी घंटी की आवाज सुन कर सभी अनुमान लगा लेते थे, कि ठाकुर जी को भोग लग गया, अब खाना मिलेगा !जब वह पूजा करने … Read more