मेरा जियरा भी ललचाए
डॉ. अनिल कुमार बाजपेयीजबलपुर (मध्यप्रदेश)************************************* छाई बदरिया कारी-कारी,झूम रही देखो डारी-डारीशाखों से लिपटी हैं शाखें,तरस रही मैं विरह की मारी। आग घुल गयी है पानी में,मजा आ रहा नादानी मेंसखियाँ कैसे भींग रही हैं,जैसे चाँद चुनर-धानी में। मेरा जियरा भी ललचाये,तन-मन मेरा भीगा जाए।चले गए परदेश पिया तुम,छोड़ मुझे सावन में हाय॥ परिचय–डॉ. अनिल कुमार … Read more