पत्थरों के शहर में…
एम.एल. नत्थानीरायपुर(छत्तीसगढ़)*************************************** पत्थरों के शहर में तो,कच्चे घर नहीं होते हैंतजुर्बों के पहर में तो,सच्चे डर नहीं होते हैं। हसरतों की दुनिया में,ये सब मौजूद होता हैरिश्तों की रूसवाईयों,साथ बावजूद होता है। इंसानी एहसास यह,पत्थर जैसा होता है,बेजान बुत भावहीन,नश्तर जैसा होता है। निगाहों की खामोशी,ये सच बयां करती हैउदासी की बेबसियां,ये कुछ कहां डरती … Read more