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‘कोरोना काल’ या ‘काल’…??

तारकेश कुमार ओझा
खड़गपुर(प. बंगाल )

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हाल में कानपुर(उप्र)जाने का कार्यक्रम रद्द किया तो मन में सहज ही यह सवाल उठा-ये कोरोना काल है या दुनिया के लिए काल है कोरोना… ?? लेखकों के एक सम्मेलन में शामिल होने का अवसर पाकर मैं काफी खुश था। सोचा कानपुर से लखनऊ होते हुए गाँव जाऊंगा और अपनों से मिल-मिला कर पटना होते हुए शहर लौटूंगा। काफी कोशिश के बाद आरक्षण पक्का हो चुका था,लेकिन तभी कोरोना के बढ़ते मामलों ने मेरी चिंता बढ़ा दी। रेलवे टाउन का छोकरा होकर भी कोरोना काल में ट्रेन में सफर के जोखिम से परेशान हो उठा। मेरा मानना है कि,स्टील और पुरुलिया एक्सप्रेस जैसी ट्रेन में दैनिक यात्रा का अनुभव रखने वाला कोई भी इंसान हर परिस्थिति में रेल यात्रा में अपने-आप सक्षम हो जाता है। करीब छह महीने तक मैंने भी इन ट्रेनों से दैनिक यात्रा की है। इसके बाद भी संभावित यात्रा को ले मेरी घबराहट कम नहीं हुई,क्योंकि मीडिया रिपोर्ट से पता लगा कि फिर तालाबंदी की आशंका से प्रवासी मजदूरों में भगदड़ की स्थिति है। रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों में भारी भीड़ उमड़ने लगी है। इस हालत में मेरी आँखों के सामने करीब २ साल पहले की एक रेल यात्रा का दृश्य घूमने लगा,जिसमें पक्का टिकट होते हुए भी थ्री टायर में महाराष्ट्र के वर्धा से खड़गपुर तक का सफर नारकीय परिस्थितियों में तय किया था। लिहाजा,कोरोना को काल मानते हुए अपना आरक्षण रद्द करा दिया। निश्चित टिकट रद कराने पर आइआरसीटीसी इतनी रकम काटती है,पहली बार पता चला। सचमुच सोचता हूँ-ये कोरोना काल है या काल है कोरोना…।

परिचय-तारकेश कुमार ओझा का नाम खड़गपुर में वरिष्ठ पत्रकार के रुप में जाना जाता है। आपका निवास पश्चिम बंगाल के खड़गपुर स्थित भगवानपुर (जिला पश्चिम मेदिनीपुर) में है। आपकी लेखन विधा अनुभव आधारित लेख,संस्मरण और सामान्य आलेख है।श्री ओझा का जन्म स्थान प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) हैL पश्चिम बंगाल निवासी श्री ओझा की शिक्षा बी.कॉम. हैL कार्यक्षेत्र में आप पत्रकारिता में होकर उप सम्पादक हैंL आपको मटुकधारी सिंह हिंदी पत्रकारिता पुरस्कार तथा श्रीमती लीलादेवी पुरस्कार के साथ ही बेस्ट ब्लॉगर के भी कई सम्मान मिल चुके हैंL आप ब्लॉग पर भी लिखते हैंL  

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