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मनुष्य की जीवटता से डरता है एवरेस्ट भी…!

अजय बोकिल
भोपाल(मध्यप्रदेश) 

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दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई बढ़ने की खबर को किस रूप में लें,गौरव में या चिंता के रूप में ? गौरव इसलिए,क्योंकि पिछले दिनों यह कहा जा रहा था कि पर्वतराज एवरेस्ट की हैसियत कुछ घट गई है,लेकिन अब नेपाल और चीन ने अधिकृत तौर पर दावा किया है कि,एवरेस्ट की ऊंचाई घटने के बजाए और बढ़ गई है। इसका अभिमानास्पद पहलू ये कि,एवरेस्ट पर चढ़ने अर्थात आकाश को ८६ सेंटी मीटर और जल्द छूना हो गया है। चिंता इसलिए,क्योंकि जितने ज्यादा लोग अब एवरेस्ट के शिखर पर चढ़ रहे हैं,उससे ऊंचाई की महत्ता कुछ कम होने लगी है। लोग चढ़ ही नहीं रहे,टनों कचरा भी वहां छोड़ने लगे हैं। यही हाल रहा तो एवरेस्ट भी महज एक पर्यटक स्थल बनकर रह जाएगा।

इस देश और दुनियाभर में घटने वाली तमाम नकारात्मक घटनाओं के बीच एक दिलचस्प खबर यह आई कि,दुनिया की सबसे ऊंची चोटी कुछ और ऊंची हो गई है। इसके पीछे कई कारण हैं,लेकिन एवरेस्ट वास्तव में कितना ऊंचा है,इसकी नपती के तरीकों पर पहले भी विवाद रहा है,क्योंकि जो सबसे ऊंचा है,उसे नापने के लिए भी इरादों की ऊंचाई चाहिए। विश्व की इस सबसे ऊंची चोटी का नाम एवरेस्ट भी १९ वीं सदी के प्रख्यात ब्रिटिश सर्वेयर और भूगोल विशेषज्ञ जाॅर्ज एवरेस्ट के नाम पर रखा गया है। उन्होंने ही सबसे पहले इस चोटी की जानकारी दी थी। संस्कृत में इसे देवगिरी कहा गया है,तो नेपाली में सगरमाथा,तिब्बती में छोमोलुंग्मा तथा चीनी में झुमुलांग्मा फेंग कहलाती है। एवरेस्ट चोटी भौगोलिक रूप में नेपाल और चीन के तिब्बत इलाके में पड़ती है। यह माना जा रहा था कि,पिछले दिनों नेपाल में आए भयंकर भूकंप के बाद चोटी कुछ नीची हो गई है। लिहाजा,नेपाल और चीनी विशेषज्ञों के दल ने सालभर मेहनत के बाद इसकी नए सिरे से नपती की। इसके बाद नेपाली विदेश मंत्री ने बताया कि,माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई अब पहले के मुकाबले ८६ सेमी (२.८ फीट) ज्यादा है। बताया जाता है कि,एवरेस्ट की ऊंचाई को लेकर विवाद इस चोटी को उस पर जमी बर्फ की पर्त के हिसाब से नापने अथवा केवल चट्टान की ऊंचाई के अनुसार नापने को लेकर था। एवरेस्ट पर तकरीबन सालभर ही बर्फ जमी रहती है। इसे हिम मुकुट कहते हैं। बिना बर्फ की इस मोटी परत के एवरेस्ट की ऊंचाई नापना,उस सर्वोच्च चोटी की तासीर को नकारने जैसा होता। लिहाजा,विशेषज्ञों ने अब इसे मान लिया है। दरअसल,एवरेस्ट की पहले वाली ऊंचाई १९५४ में भारत के ‘सर्वे ऑफ इंडिया’ ने तय की थी। तब से चीन का दावा था कि,एवरेस्ट इससे कहीं ज्यादा ऊंचा है।

अब सवाल यह है कि,एवरेस्ट की ऊंचाई नापने का पैमाना क्या है ? नई ऊंचाई भी किस आधार पर तय की गई है ? नेपाल ने बंगाल की खाड़ी को समुद्र सतह माना,जबकि चीन ने पीला सागर की समुद्र सतह को आधार माना। समुद्र सतह का महत्व इसलिए है,क्योंकि अगर केवल सीधे पर्वत की ऊंचाई को देखें तो दुनिया में एवरेस्ट से ऊंचे कई पहाड़ हैं,लेकिन जब उनकी नपती समुद्र सतह से की गई तो वो एवरेस्ट के आगे बौने साबित हुए। अगर किसी रास्ते की लंबाई से इसकी तुलना करें तो एवरेस्ट करीब पौने ९ किलोमीटर लंबा है। फुट में गिनें तो यह २९०३१.७ है। ऊंचाई की यह गणना त्रिकोणमिति सूत्रों के जरिए होती है। अर्थात,त्रिकोण की ऊंचाई को इसके कोणों और आधार रेखा से गुणित किया जाता है।

संभव है कि,हमारे पूर्वजों को एवरेस्ट के बारे में बहुत ज्यादा पता न हो,लेकिन इसकी लगभग सही ऊंचाई बताने का श्रेय भी हमारे ही खाते में है। प्रसिद्ध बंगाली गणितज्ञ और सर्वेयर राधानाथ सिकदर ने १८५६ में ही दुनिया को बता दिया था कि,एवरेस्ट २९ हजार फुट ऊंचा है। यह गणना उन्होंने तब की थी,जब तब न तो कम्प्यूटर थे,न जीपीएस था और न ही हिमालय को आकाश से देखा जा सकता था। राधानाथ‍ ‍सिकदर स्वयं भी जार्ज एवरेस्ट के शिष्य थे।

एवरेस्ट की यह अनुपम और कठिन ऊंचाई साहसी पर्वतारोहियों के लिए हमेशा अटूट आकर्षण और कड़ी चुनौती का कारण रही है। प्राचीन काल में भी साहसी लोग इतनी ऊंचाइयां नापते रहे होंगे,लेकिन इसके ज्यादा प्रमाण मौजूद नहीं है। जबसे पर्वतारोहण एक व्यवस्थित और जोखिम भरी कला और खेल के रूप में विकसित हुआ है,तबसे एवरेस्ट फतह करना और इसी के बहाने प्रकृति पर अपनी श्रेष्ठता जताने का जुनून मनुष्य मात्र में कुलबुलाता रहा है। भयंकर बर्फीले तूफानों,बहुत कम प्राणवायु और ग्लेशियरों के टूटने के जानलेवा खतरों के बीच विजय प्राप्त करना आज भी एक विरल उप‍लब्धि है। एवरेस्ट विजय की कोशिश में करीब ३०० पर्वतारोही जान गंवा चुके हैं। कहते हैं कि,२०० पर्वतारोहियों की लाश अभी भी एवरेस्ट के रास्तों में दफन हैं।

वैसे,एवरेस्ट पर चढ़ाई करने के प्रामाणिक प्रयास १०० साल पहले ही शुरू हुए हैं। एवरेस्ट पर चढ़ने के कुल १७ रास्ते हैं। इस तरह की पहली ज्ञात कोशिश ब्रिटिश पर्वतारोहियों ने १९२१ में की थी। यह दल तिब्बत वाले रास्ते से गया था,क्योंकि तत्कालीन नेपाल सरकार ने एवरेस्ट पर चढ़ाई की इजाजत नहीं दी थी। उसके बाद तो कई पर्वतारोही अभियान हो चुके हैं। २०१९ तक कुल ५२९४ लोग एवरेस्ट पर चढ़कर ‘वी’ का निशान बना चुके हैं। एक तरह से एवरेस्ट रोहण भी ‘खेल’ बन चुका है,पर इसी के साथ एवरेस्ट पर कचरा भी बढ़ रहा है। बताया जाता है कि ३० टन कचरा अभी भी पड़ा हुआ है।

वैसे,एवरेस्ट कैलाश पर्वत से ८ हजार फीट ज्यादा ऊंचा है। और तो और एवरेस्ट की चोटी पर तो २ लोगों के एकसाथ खड़े होने लायक जगह भी नहीं है। हमारे देश की पहली महिला एवरेस्ट विजेता बछेंन्द्री पाल को ‍एवरेस्ट पर अपने सहयोगी के साथ खड़े रहने के लिए फावड़े से कुरेद कर जगह बनानी पड़ी थी। यह सचमुच हैरानी की बात है कि,कैलाश पर्वत हमारे लिए पूज्य है,लेकिन एवरेस्ट नहीं। हो सकता है कि हमारे पूर्वजों को हिमालय का तो बखूबी पता था,लेकिन उसकी सर्वोच्च चोटी एवरेस्ट की ज्यादा जानकारी न हो।

कहने का आशय ये कि,केवल ऊंचाइयां आस्था का विषय नहीं होतीं,लेकिन ऊंचाइयां चुनौतियों का नया लक्ष्य जरूर स्थापित करती हैं। मनुष्य की यही खासियत है कि, वह आस्था के समंदर में डुबकी लगाने के बाद भी चुनौतियों को स्वीकार करने का जुनून कभी मरने नहीं देता। शायद इसीलिए, कैलाश पर्वत पर भले देवताओं का वास हो,लेकिन एवरेस्ट पर मनुष्य की पताका लहराती है। लगता है खुद एवरेस्ट भी इंसान की इसी जीवटता से डरता है,शायद इसीलिए वह अपनी ऊंचाई और बढ़ा रहा है।