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मुझे भी जीने का हक

डॉ. आशा गुप्ता ‘श्रेया’
जमशेदपुर (झारखण्ड)
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युगों-युगों से तुम कहते,
देवी मान कभी हो पूजते
माता सखी बहन प्रेयसी,
कितने रुपों में मैं जीती।

गर्भ में तुम्हें धारण कर,
सौ-सौ मन्नतें मैं माँ करती
तुम्हारी तुतलाती सुन बातें,
हँसती औ बलैया मैं लेती।

बहना हूँ भैया उम्र बढा़ती,
देख मेरे अल्हड़ भावों पर
और हिरनी-सी चालों पर,
तुम रीझते मैं मुस्काती।

चाँद है कहते सितारे बताते,
संगिनी बन प्रेम बरसाती
घर-बाहर हूँ संभालती,
बघ्चों की अम्मा कहलाती।

तुम्हारी हर दी पीडा़ को,
अपना समझ गले लगाती
मैं जो गुण शिक्षा हूँ पाती,
संतान उत्तम मैं हूँ बनाती।

प्रगति समाज और देश,
भविष्य का मैं राह बनाती
कभी गर्भ में हो मुझे मारते,
दहेज,प्रेम बलि बन जाती।

तुम्हारी सोच कहाँ है बदली,
भोग की वस्तु हो समझते
तोड़-मोड़ के स्वाँस रोकते,
नोंच से तुम्हारे हूँ मैं तड़पती।

वहशीपन ये तुममें कैसा,
बिना जलाए नहीं हो रहते
तुम बनते हो भक्षक दरिंदे,
कैसी पीढी़ है ये पनपती।

हर गली नुक्कड़ राह पर,
पौरुष का दम हो भरते
घिन आती है दु:ख होता,
तुममें निम्न कैसी ये समाई।

भयभीत कब तक रहूँ तुमसे,
क्यों ना जीवन मैं जीऊँ
नही करने दूँगी अब मैं ऐसा,
जैसे करनी वैसा हो भरनी।

अधिकार नहीं मेरी स्वाँसों पे,
मुझे भी जीने का हक है
क्या तुमने कभी भी सोचा,
मुझ बिन जिंदगी कैसी होती॥

परिचय- डॉ.आशा गुप्ता का लेखन में उपनाम-श्रेया है। आपकी जन्म तिथि २४ जून तथा जन्म स्थान-अहमदनगर (महाराष्ट्र)है। पितृ स्थान वाशिंदा-वाराणसी(उत्तर प्रदेश) है। वर्तमान में आप जमशेदपुर (झारखण्ड) में निवासरत हैं। डॉ.आशा की शिक्षा-एमबीबीएस,डीजीओ सहित डी फैमिली मेडिसिन एवं एफआईपीएस है। सम्प्रति से आप स्त्री रोग विशेषज्ञ होकर जमशेदपुर के अस्पताल में कार्यरत हैं। चिकित्सकीय पेशे के जरिए सामाजिक सेवा तो लेखनी द्वारा साहित्यिक सेवा में सक्रिय हैं। आप हिंदी,अंग्रेजी व भोजपुरी में भी काव्य,लघुकथा,स्वास्थ्य संबंधी लेख,संस्मरण लिखती हैं तो कथक नृत्य के अलावा संगीत में भी रुचि है। हिंदी,भोजपुरी और अंग्रेजी भाषा की अनुभवी डॉ.गुप्ता का काव्य संकलन-‘आशा की किरण’ और ‘आशा का आकाश’ प्रकाशित हो चुका है। ऐसे ही विभिन्न काव्य संकलनों और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में भी लेख-कविताओं का लगातार प्रकाशन हुआ है। आप भारत-अमेरिका में कई साहित्यिक संस्थाओं से सम्बद्ध होकर पदाधिकारी तथा कई चिकित्सा संस्थानों की व्यावसायिक सदस्य भी हैं। ब्लॉग पर भी अपने भाव व्यक्त करने वाली श्रेया को प्रथम अप्रवासी सम्मलेन(मॉरीशस)में मॉरीशस के प्रधानमंत्री द्वारा सम्मान,भाषाई सौहार्द सम्मान (बर्मिंघम),साहित्य गौरव व हिंदी गौरव सम्मान(न्यूयार्क) सहित विद्योत्मा सम्मान(अ.भा. कवियित्री सम्मेलन)तथा ‘कविरत्न’ उपाधि (विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ) प्रमुख रुप से प्राप्त हैं। मॉरीशस ब्रॉड कॉरपोरेशन द्वारा आपकी रचना का प्रसारण किया गया है। विभिन्न मंचों पर काव्य पाठ में भी आप सक्रिय हैं। लेखन के उद्देश्य पर आपका मानना है कि-मातृभाषा हिंदी हृदय में वास करती है,इसलिए लोगों से जुड़ने-समझने के लिए हिंदी उत्तम माध्यम है। बालपन से ही प्रसिद्ध कवि-कवियित्रियों- साहित्यकारों को देखने-सुनने का सौभाग्य मिला तो समझा कि शब्दों में बहुत ही शक्ति होती है। अपनी भावनाओं व सोच को शब्दों में पिरोकर आत्मिक सुख तो पाना है ही,पर हमारी मातृभाषा व संस्कृति से विदेशी भी आकर्षित होते हैं,इसलिए मातृभाषा की गरिमा देश-विदेश में सुगंध फैलाए,यह कामना भी है

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