गणतंत्र दिवस

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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पावन गाथा शौर्य का,कुर्बानी सत्नाम।
आज़ादी माँ भारती,लोकतंत्र अभिराम॥

वर्षों की नित साधना,सहे ब्रिटानी घात।
कोटि-कोटि बलिदान दे,पा स्वतंत्र सौगात॥

लुटीं अस्मिता इज़्ज़तें,ब्रिटानी अत्याचार।
तन मन धन अर्पित वतन,पराधीन उद्धार॥

सही यातना कालिमा,मीसा त्रासद जेल।
तहस-नहस संवेदना,दानवता का खेल॥

खाये डंडे गोलियाँ,शैतानी परतंत्र।
जलियाँवाला त्रास भी,तभी मिला गणतंत्र॥

कोल्हू के बैलों समा,रौंदे गये किसान।
लाख-लाख बहू बेटियाँ,लुटी लाज दी ज़ान॥

छत्रपति शिवराज सम,था प्रताप जांबाज़।
तात्या लक्ष्मी कुँवर सम,नाना सम सरताज़॥

भगत राजगुरु लाजपत,सुखदेव खुदी राम।
रोशन बिस्मिल चन्द्र सम,सावरकर अभिराम॥

जंजीरों की सीखचें,सुन भारत चीत्कार।
टूट पड़ा पूरा वतन,लेने को प्रतिकार॥

सत्य अहिंसा नीति रथ,आज़ादी की क्रान्ति।
जवाहर गाँधी पटेल,तिलक चले पथ शान्ति॥

बजा बिगुल जनक्रान्ति का,बना सुभाष नेतृत्व।
आजाद हिन्द की फ़ौज भी,आयी अब अस्तित्व॥

आजादी तुमको वतन,चाहत यदि दो खून।
चलो साथ मर्दन करें,अंग्रेजों को भून॥

कोटि-कोटि सैलाब जन,चला राष्ट्र बलिदान।
भारत माँ जयगान से,पा सुभाष वरदान॥

शान्तिदूत दूसरे तरफ,चल बापू नेतृत्व।
भारत छोड़ो अंग्रेजों,सत्याग्रह अस्तित्व॥

जयप्रकाश राजेन्द्र सम,कृपलानी रणवीर।
किचलू शास्त्री मौलाना,आज़ादी तकदीर॥

लाखों की कुर्बानियाँ,गये करोड़ों जेल।
मिली तभी स्वाधीनता,सत्य त्याग श्रम मेल॥

अभिलाषा नवराष्ट्र की,सार्वभौम गणतंत्र।
ध्येय मनसि चहुँमुख प्रगति,भारत बने स्वतंत्र॥

पर सत्ता कुछ लालची,खण्डित भारत देश।
किया विभाजन धर्म पर,पाक बना परदेश॥

लाशों के आसन्द पर,बैठे सत्ताधीश।
संविधान पीठ हो गठित,राजेन्द्र पीठाधीश॥

सच्चिदानंद सभापति,बीता द्वितीय वर्ष।
संविधान अंतिम रूप,भीमराव निष्कर्ष॥

लोकतंत्र उन्नत सबल,हो शिक्षित परिवेश।
नीति-रीति सदभावना,सर्वधर्म संदेश॥

खोज-खोज अच्छाईयाँ,लाए देश-विदेश।
संसदीय सुदृढ़ वतन,संघीय राष्ट्र प्रदेश॥

न्यायपालिका हो शिखर,माने सब आदेश।
निर्माणक कानून का,संसदीय पटलेश॥

विधायी कार्यपालिका,न्यायालय तिहुँ शक्ति।
केन्द्र प्रदेश मिल सूचियाँ,समवर्ती अनुवृत्ति॥

बचे निज मूलाधिकार,बोधन जन कर्तव्य।
राज बने पंचायती, सब जन सुख ध्यातव्य॥

जाति धर्म भाषा बिना,समरस बिन दुर्भाव।
निर्भय नर-नारी सबल,रहें सुखी निज चाव॥

समता अरु सहभागिता,अधिकारी अभिव्यक्ति।
स्वधर्मी उन्मुक्त जन,राष्ट्र-धर्म आशक्ति॥

राष्ट्र प्रीति सदभक्ति नित,मानवता हो रक्ष्य।
उद्योगी विज्ञानी वतन,महाशक्ति हो लक्ष्य॥

बने सुखद शिक्षित सभी,न दीन धनी विभेद।
पड़े राष्ट्र जब आपदा,मददगार संवेद॥

विश्वगुरु फिर से बने,निधि किसान विज्ञान।
बढ़े आन सम्मान नित,भारत देश महान॥

लहराए नभ तिरंगा,स्वाभिमान जनतंत्र।
यही सोच अम्बेडकर,नवभारत गणतंत्र॥

शान्ति चैन सुख सम्पदा,मुख सरोज मुस्कान।
परमारथ आपद समय,खड़े बने वरदान॥

ध्येय मनोहर चारुतम,संविधान आधार।
प्रगति परक आरोग्यतम,स्वच्छ राष्ट्र सरकार॥

पर अवसादित अवदशा,प्रसरित आपस द्वेष।
घृणा लोभ ईर्ष्या कपट,हिंसक अब परिवेश॥

तार-तार सदभावना,लूट मार मदहोश।
सत्ता सुख के लालची,राष्ट्र विरोधी जोश॥

स्वार्थ-सिद्धि में बदजुबां,बोले पाकी बोल।
मिले साथ आतंक के,पाक मुल्क अनमोल॥

लोभी हैं नासूर बन,नेता ये प्रतिपक्ष।
जला रहे गणतंत्र को,दंगाई संरक्ष॥

धमाचौकड़ी लूट की,पल-पल रच साजिश।
शर्मसार गणतंत्र है,व्यभिचारी माचीश॥

सरकारी जन सम्पदा,जला रहे उन्माद।
निडर बने हिंसक जना,अवरोधित बर्बाद॥

दिवस आज गणतंत्र का,मनाए क्या ‘निकुंज।’
पाक साथ गद्दार भी,हो विनाश जग गूँज॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥